Thursday, 4 February 2021

सब से बड़ा आश्चर्य

आत्मदीप

लघु काल-चिन्तन ९१

"सब से बड़ा आश्चर्य"

निबन्ध प्रतियोगिता चल रही थी। भाग लेने वालों में सात से ले कर सत्तर बरस के बच्चे, स्त्री, पुरुष शामिल थे। विषय था "दुनिया के महान आश्चर्य क्या हैं?" समय था तीस मिनिट। सबने लिखा और समय पूरा होने पर प्रेक्षक को दे दिया। एक

बालिका ने अपना पर्चा नहीं दिया वह अभी भी खिड़की से बाहर आसमान की तरफ एक टक देख रही थी। प्रेक्षक ने कहा तुम्हारा लिखने का समय पूरा हो गया अब अपना पर्चा जमा कर दो। बालिका की तन्द्रा टूटी और अचकचा कर अपना पर्चा प्रेक्षक को थमा दिया। सारे पर्चों की निर्णायकों ने जाँच की। अधिकतर लोगों ने स्कूल में पढ़े-पढ़ाये, सुने-सुनाए आश्चर्यों का जिक्र किया था।
परिणाम सुनाने के बजाय निर्णायक ने उस बालिका का पर्चा लोगों को सुनाया और कहा कि अन्तिम निर्णय आप लोग ही करें।
बालिका के पर्चे में लिखा था - मैं दुनिया के आश्चर्यों को नहीं जानती। मेरे घर के ड्राइंगरूम में एक पेंटिग लगी है जिसमे प्रकृति का सुन्दर चित्रण है। वह कुछ हजार रुपयों की है। मुझे आश्चर्य है कि खिड़की से झाँकते ये पेड़ पौधे, बाग बगीचे कितने मूल्यवान होंगे। मैं हाड़ माँस की बनी हूँ पर फिर भी सुन सकती हूँ, बोल सकती हूँ, चल फिर सकती हूँ और मन चाहा कुछ भी कर सकती हूँ। मेरी छोटी सी आँख की पुतलियों में कितना बड़ा आकाश समा जाता है। मैं बस महसूस कर रही हूँ। मैं क्या क्या गिनाऊँ..? रुआँसे परीक्षक ने कहा कि मैं पूरा पढ़ने के बजाय आखिरी लाइन पढ़ता हूँ.."इन आश्चर्यों को मैं जीवन भर लिखती रहूँ तो भी कभी पूरा लिख नहीं पाऊँगी।"

"आओ चलो! ऐसा बचपना ला कर देखें।"

रामनारायण सोनी
०५.०२.२१

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श्री

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