लघु काल-चिन्तन ९०
"परमात्मा कितना दयालु है"
तुम समुन्दर देखने गये और किनारों पर फैली रेत वहाँ इकट्ठी हुई कुछ फैन, उठती गिरती लहरें देख कर लौट आये तो तुम्हारा देखना अधूरा है। समुन्दर में एक पूरा का पूरा संसार है। वहाँ जलीय वनस्पतियाँ, रंगबिरंगी मछलियाँ, खूबसूरत प्रवाल, मोतियों भरी सीपें भी मौजूद है। ऊपर से कोलाहल भरे तल के नीचे नीरवता, चिर प्रशान्ति और गहनता विद्यमान है। वहाँ भी जीवन दौड़ता, खेलता कूदता है, मचलता है। उन जीवों का वहाँ भी एक जीता जागता संसार है। यह समुन्दर आत्मसंयमी है, अपने निर्बन्ध किनारों को हदें मान कर उसमें संयत रहता है। खुद तपता है और अपने खारे जल से मीठा जल निकाल कर पूरी धरती को देता है। अपनी छाती पर तुम्हारे माल असबाब देश-देशान्तर में ढोता है। वैसे ही वनों को भी बियाबान समझ कर ही देखा है, उन्हें बस बीहड़ समझा है। वे पूरे जगत को खनिज, ओषधियाँ, नदियाँ, ईंधन और भी अनगिनत चीजें देता है। सूरज ऊर्जा के भण्डार लिये सतत खड़ा है। चाँद भी आता है अपनी शीतल चाँदनी ले कर। तुमने इन्हें भी इस तरह नहीं देखा होगा। और जिस धरती पर तुम खड़े हो उसे माँ की तरह हमने शायद कभी देखा ही नहीं। हमने अपने ऐशो-आराम के लिये इन सब में जगह जगह विकृतियाँ पैदा करने में कसर नहीं छोड़ी है।
प्रकृति का कण-कण पूरी मानवता और जीवजगत के पोषण में रात-दिन, क्षण-क्षण लगा हुआ है। प्रकृति के ये उपकार हम पर ऋण हैं। पे बेक का भी सोचें। वह परमात्मा कितना दयालु है।
हमने शायद सिक्के का उसके नगदी वाला पहलू देखा और उसके बदले में जीवन के उपयोगी सामान खरीदे हैं। इसके दूसरे पहलू में राष्ट्र की अस्मिता, जीवन मूल्यों का अहसास और उस के पुंसत्व की संप्रभुता दिखाई नहीं देती। हम प्रकृति के कल्याण कारी तत्वों का अहसास करें और उस सृष्टिकर्ता के प्रति कृतज्ञता का भाव रखें।
रामनारायण सोनी
०४.०२.२१
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