लघु काल-चिन्तन उपनिषदों पर आधारित दर्शन को प्रायोगिक और व्यावहारिक धरातल पर उतरने का प्रयास है, लघु से तात्पर्य यह है की ये आलेख छोटे-छोटे हैं लेकिन इन में समाहित विचार नितान्त दार्शनिक है. अधिकतर आलेखों में रूपकों के माध्यम से अपनी बातें कही गई है. सभी आलेख आत्मनुभूति और सकारात्मक ऊर्जा का आह्वान करते है.
Tuesday, 2 March 2021
समर्पण और कृतित्व
जीवन का यह क्षण अवसर है
आत्मदीप
लघु काल-चिन्तन १०८
"जीवन का यह क्षण अवसर है"
क्या जीवन का मूल्यांकन कुल ली गई सांसें है, या कि जी गई उम्र है या फिर वे सार्थक क्षण हैं जो जीवन को जीवन्त बना गये। सांसें हमारे जीवित होने की पहचान है पर केवल ऐसा किया जाना जीवन अवमूल्यन है। कुछ दिनों, वर्षों या एक उम्र भर जी लेना भी जीवन का मूल्यहीन रह जाना ही है। जीवन का वास्तविक मूल्य उन क्षणों से है जो हममें गुणात्मक परिर्वतन लाते हैं।
गुरू द्रोण के सभी शिष्यों ने एक समान समयावधि में जो जो सीखा और उसे आत्मसात किया उनमें से अर्जुन ने श्रेष्ठ प्राप्त किया क्योंकि उसने हर क्षण को अवसर में बदल कर अपनी साधना को परिपूर्ण किया। लुहार की मरी खाल से बनी उस धौंकनी की तरह साँसे ले कर छोड़ देने में ही इन क्षणों को बिता दिया तो क्या हासिल होगा? इसी तरह जैसे कपड़े की लम्बाई, पत्थर का वजन, पानी के आयतन की नाप की तरह हमने जीवन को नाप भर लिया तो हमारी उम्र भी जीवन की नाप जरूर है पर यह जीवन को सार्थकता और सफलता के मुकाम पहुंचाने में पर्याप्त नहीं है। रास्ते में गड़े पत्थर की उम्र भी हम से अधिक है। वस्तुतः हर उपलब्ध क्षण की उपयोगिता होने पर जीवन में सकारात्मकता लाई जा सकती है। किसी अवसर भरे क्षण को खोना जीवन का अवमूल्यन ही है क्योंकि समय की गति इर्रिवर्सिबल है। हम उस व्यतीत अतीत में झाँक तो सकते हैं पर उसमें लौट कर जा नहीं सकते। हर क्षण उस परमेश्वर का अनुपम उपहार है इसे व्यर्थ न गवाएँ, इस पल को उस अर्थ में जी कर कुछ अच्छा कर जाएँ।
रामनारायण सोनी
०३.०३.२१
आत्मानन्द के द्वार पर
Monday, 1 March 2021
समत्व योग
आत्मदीप
लघु काल-चिन्तन १०५
"समत्व योग"
दो पूनम के बीच एक अमावस क्यों आती है यह एक सोच है और यह सच भी है। दूसरी सोच है चाहे जितनी अमावस आवें बीच में पूनम आवेगी ही, यह भी तो सच ही है। दोनों सच स्वीकार्य होने चाहिये पर जीवन में सकारात्मक सोच के विकास के लिये दूसरी तरह की धारणा आवश्यक है। अन्धकार और प्रकाश के बीच द्वन्द्व कभी नहीं था क्योंकि वे चिर संगी हैं और नियति का आवश्यक अंग भी हैं। सुख और दु:ख जीवन की बहती नदी के दुकूल हैं और आवश्यकीय अंग भी हैं। भिन्न भिन्न प्रतिकूलताएँ दुनिया में मौजूद हैं पर उनके बीच समन्वय रख कर खड़े रहना योगी का प्रधान गुण है। वह समझता है दोनों अनित्य हैं आवेंगे भी और चले भी जाएँगे। नदी में बहाव तो आम रहता है पर बाढ़ नित्य नहीं रहती। हर पतझड़ के बाद बसन्त आता है। आंधियाँ, बिजली की कौंध और बारिश कष्ट और असुविधा भले ही पैदा कर दे पर जल के रूप में जीवन का संचार होता है। ज्वालामुखी का फटना त्रासदी है पर लावा जमेगा तब मिट्टी बन सोना उगलेगी। एक ध्वंस के बाद सृजन का अवतरण होता है।
प्रतिक्षा करो अनुकूल समय की। अपनी संवेदनाओं पर संयम रखें। यही समत्व योग है।
रामनारायण सोनी
०१.०३.२०२१
श्री
अनुक्रम 1 अयं आत्मा ब्रह्म 2 विक्षिप्त अथवा मुक्त 3 अद्वैताभास 4 शब्द ब्रह्म 5 जड़ में चेतन और चेतना का दर्शन 6 "समस्त ...
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लघु काल-चिन्तन ९० "परमात्मा कितना दयालु है" तुम समुन्दर देखने गये और किनारों पर फैली रेत वहाँ इकट्ठी हुई कुछ फैन, उठती गिरती लहर...