आत्मदीप
लघु काल-चिन्तन १०६
"आत्मानन्द के द्वार पर"
जब आप अपने प्यारे बच्चों की तोतली भाषा में मग्न हो जाते हो, जब आप अपनी माँ की प्यारी गोद में समा जाते हो, जब आप अपनी प्यारी बहना के प्रेम का अनुभव करते हो, तब आप एक चलते फिरते संसार से अलग थलग हो जाते हो।
जब कोई अपनी प्रियतमा के साथ अन्तरंग क्षणों में खो जाता हो तब शेष जगत खो जाता है। जब आप प्रकृति के सुरम्य दृश्यों में लयलीन हो जाते हो, पक्षियों के कलरव में, आकाश की गंभीरता में खो जाते हो तब तब निश्चित ही शेष जगत का प्रलय हो जाता है। यह धारणा के उपरान्त ध्यान की आरम्भिक अवस्था की तरह है। आप उस अप्रतिम और अद्भुत क्षण के साक्षात्कार में खड़े हो। जगत है, पर नहीं है। है भी और नहीं भी है। ऐसे समय आप वीतरागी हैं। कुछ देर के लिये ही सही इस परिदृश्य का उपस्थित होना आत्मानुभूति का आभास है। आत्मा की तीसरी अवस्था सुषुप्ति है यहाँ समस्त इन्द्रियाँ मन में और फिर मन प्राण में लीन हो जाता है। चूँकि संसार मनोमय है अतः मन की इस लयावस्था में आप आनन्द का अनुभव करते हो। आनन्द परमात्मा का दूसरा नाम है।
रामनारायण सोनी
No comments:
Post a Comment