लघु काल-चिन्तन उपनिषदों पर आधारित दर्शन को प्रायोगिक और व्यावहारिक धरातल पर उतरने का प्रयास है, लघु से तात्पर्य यह है की ये आलेख छोटे-छोटे हैं लेकिन इन में समाहित विचार नितान्त दार्शनिक है. अधिकतर आलेखों में रूपकों के माध्यम से अपनी बातें कही गई है. सभी आलेख आत्मनुभूति और सकारात्मक ऊर्जा का आह्वान करते है.
Sunday, 31 January 2021
जीवन एक कहानी है
प्रेम की आनन्दानुभूति
प्रतीति
आत्मदीप
लघु काल-चिन्तन ७८
प्रतीति
क्या तुमने गुड़ की मिठास, वंशी की स्वर लहरियाँ, पानी का गीलापन, तुममें जल रहे ताप को देखा है? यदि हाँ, तो जैसी भी आड़ी तिरछी बन सके उसकी तसवीर बनाओ तो मानें। यह सम्भव नहीं है।
एक दिन किसी ने मुझसे पूछा आपने किस विषय में इन्जीनियरिंग किया है? मैंने कहा विद्युतीय में। उसने कहा विद्युत मतलब बिजली, मैने कहा- हाँ। पाँच साल इसी बिजली को पढ़े हो, चालीस साल तक इसी की नौकरी खाते रहे हो तो बताओ बिजली कैसी होती है? दिखाओ भी। मैं अवाक रह गया, नहीं बता सका। वह बोला आज जान कर ही जाऊँगा। मैने केबल के दो तार प्लग में लगाए, स्विच आन कर दिया और उससे कहा दोनो तार पकड़ो। वह समझ चुका था कि विद्युत को जानना है तो उसके जन्य प्रभाव से उसे पहचाना जा सकता है लेकिन फिर भी उसे जाना नहीं जा सकता। वेद ने कहा है "विद्युत ब्रह्मेति"। हमारा हृदय भी आन्तरिक विद्युत तरंगों से धड़कता है। हम धड़कन को महसूस करते हैं। यह प्रतीति है। प्रीति याने 'प्रेम' भी प्रतीति है। ईश्वर भी देखा या दिखाया नहीं जा सकता वह भी प्रतीति है। विवेकानन्द यहाँ वहाँ महापण्डितों के पास भटकते रहे पर अन्त में रामकृष्ण परमहंस उन्हें उस प्रतीति तक ले गए। जानने के चक्कर में न पड़ो ईश्वर तुम्हारे आस पास, तुम्हारे भीतर बाहर मौजूद है। वह सार्वदेशीय, सार्वभौमिक, सर्वकालिक, जगदीश है, जगन्निवास, जगन्नियंता है। उसकी प्रतीति करो। चाँद की चाँदनी पकड़ने की कोशिश मत करो उसकी शीतलता महसूस करो। सर्दी लगे तो धूप को ओढ़ो बिछाओ। जल प्यास नहीं बुझाता उसकी शीतलता प्यास बुझाती है, महसूस करो। प्रेम शरीर से नहीं आत्मा से करो। प्रीति की प्रतीति करो। गुड़ गुड़ कहने से मुँह मीठा नहीं होगा। मिठास की बस प्रतीति करो।
तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके ।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ।।५ ।।ईशावास्योपनिषद्।।
यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्नेवानुपश्यति।
सर्व भूतेषुचात्मानं ततो न विजुगुप्सते।।६ ।।ईशावास्योपनिषद्।।
रामनारायण सोनी
२१.०१.२१
चिलम और सुराही
Saturday, 30 January 2021
बचे हुए आलेख
4. 48. 49. 51. 57. 58. 71, 74, 75, 76, 79, 80, 81
[30/01, 21:39] Ramnaraysn Soni: "आत्मदीप"
लधु काल-चिन्तन 6
"विचार और व्यक्तित्व"
एक दिन मैं आइने के सामने खड़ा हो गया। यह क्या? मैं कई टुकड़ों में दिखाई दे रहा हूँ। मैंने खुद को सम्हालते हुए देखा मैं तो पूरा हूँ, संपूर्ण हूँ। दरअसल, आइना ही टूटा हुआ था। टूटे हुए आईने में मैं भी कई टुकड़ों में दिखाई दे रहा था। मैंने देखा कि बिम्ब नहीं प्रतिबिम्ब टूटा हुआ था। टूटा आइना फेंक कर मैं साबुत आइना ले आया जिसमें पूर्ण दिखने लगा।
इसलिये आईने की विकृति अपने ऊपर ओढ़ने से बचो। बिना आईने के अपना चेहरा देख भी नहीं पाओगे। आईना ही आपको अपना प्रतिबिम्ब दिखाएगा।
इसी तरह जिन विचारों में आप स्वयं ही टूटे हुए दिख रहे हो वे आपको चैन से नहीं रहने देंगे। अपना समूचा व्यक्तित्व अपने विचारों का ही प्रतिफल है। जो विचार आपने धारण किये होंगे उन्होंने ही आपका अपना जीवन निर्मित किया है।
विचार के महासागर में से मरी हुई बदबूदार सीपियाँ चुनते हो या मोती, यह आपके ऊपर है।
रामनारायण सोनी
०२.०६.२०२०
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अपने आसपास के दृश्य संसार के पीछे झाँकने के प्रयत्न ही आत्मबोध की ओर ले जाएगा। इसके लिये अपनी मनश्चेतना, मानसिक अनुभूति और अंतर्दृष्टि ही समस्थान है।
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[30/01, 21:47] Ramnaraysn Soni: लघु काल-चिन्तन ५७
"जीवन अनमोल निधि है"
महुए की डाल हरियाई न्योता दे कर चली गई, हवा अमलतास के अलिन्दों से मकरन्द चुरा कर तुम्हारे नथुनों के पास लाई और उल्टे पैर लौट गई, गुनगुन करते मधुप कानों में सरोद बजा कर अनमने लौट गए। कहाँ था मैं और कहाँ थे तुम। आँख, नाक, कान तुम्हारे बुत से चिपके रहे पर तुम तक कुछ पहुँच नहीं सका।सिर्फ इसलिये कि हम वहाँ हो कर भी वहाँ नहीं थे। ध्यान से देखो! हम पूरे के पूरे वहीं थे परन्तु हमारा एक मन कहीं ओर चला गया था।
इस सम्पूर्ण सृष्टि में सब से तेज दौड़ने वाला मन है। मन मनुष्य को अपनी इच्छा के अनुसार उसी प्रकार घुमाता है जैसे कोई अच्छा सारथि लगाम के सहारे वेगवान् घोड़ों को अपनी इच्छा के अनुसार नियंत्रित करता है। इन्द्रियाँ बाहरी सूचनातन्त्र के द्वार हैं कहें तो रिसिप्टर हैं जो मन की आज्ञा से खुलते हैं और जो कुछ भी लेते हैं वह मन को ही पहुँचता है। मन न चाहे तो सूचनाएँ (इन्द्रियों के विषय) द्वार ही से लौट जाती है। इसके बड़े नुकसान और बड़े फायदे हैं। मन न चाहे तो देखा सुना आदि सब अनदेखा अनसुना रह जाता है वहीं उसकी इच्छा हिमालय की तराई देखना चाहता हो तो वहाँ दौड़ा कर ले जाता है। इसलिये बहुत सारे विकल्पों में से चुनिन्दा एक संकल्प चाहिये। अगर संकल्प न हो तो इसमें उठे चक्रवात हमें यहाँ वहाँ दौड़ाएँगे ही।
"हम दिशाएँ तय कर के संकल्पवान बनें वर्तमान में जिएँ।
"जीवन परमात्मा का अनमोल उपहार है।"
रामनारायण सोनी
[30/01, 21:47] Ramnaraysn Soni: लघु काल-चिन्तन ५८
"मैं मुझ में ही हूँ"
आज़ाद रिश्तों में हम बंधन ढूँढते हैं और बंधे रिश्तों से आज़ादी चाहते है। है न बड़े आश्चर्य की बात? लेकिन जंजीरों से मोहब्बत रखने वालों को कोई आज़ाद नहीं कर सकता। सीमाएँ आजादी के दायरे निश्चित करती है पर आजादी सीमाओं की पर्वाह नही करती। एक बात और है कि धुंध के आवरण में आजादी और सीमाएँ दोनों का पता नहीं चलता।
इस सर्च में अपना "मैं" खो बैठे हैं। मैं पाकिटमारों से अपने चोरी गए बटुए का पता पूछ रहा हूँ।
बन्धे को बन्धा मिले, छूटे कौन उपाय।
कर संगति निरबन्ध की, पल में लेय छुड़ाय॥
जंजीरों में वह भी बँधा है और निर्बन्ध कौन है? मुक्त कौन है?
मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? मेरा अस्तित्व मुझे ही पता नही। मैं स्वयं को जन्म जन्मान्तरों से ढूँढ रहा हूँ। मुझ से मैं कभी नही मिल पाया।
ढूँढने बैठा स्वयं को
आ गया हूँ मैं कहाँ तक ।
दर्पण पर गर्द चढ़ गई और मेरे बिम्ब के बीच में आ जाने से "मैं" अनभिव्यक्त हूँ। आवरण के हटते ही दृष्टि की सीमाएँ समाप्त हो जावेंगी। मैं और मेरा प्रतिविंब आज़ाद हो जावेंगे। जिन्हें हम सीमा समझ बैठे है असल में वे सब आवरण ही हैं। मैं मुझमें ही मौजूद हूँ।
"ज्यों पुहपन में बास"
रामनारायण सोनी
[30/01, 21:48] Ramnaraysn Soni: लघु काल-चिन्तन ५१
"पानी की लहर पानी है"
सागर के तल पर नटखट तरंगें अठखेलियाँ करती है। उछलती-कूदती, नाचती है। हर एक लहर बीच सागर में न मरे तो किनारे पर आ कर मर जाती है। लहर मर कर गई कहाँ? लहर क्या है? कहाँ से आई? बिना पैर के चलती है, बिना मुँह के शोर मचाती है, बुलबुलों से फेन बनाती है। लहर एक कमाल ही है न। असल में यह 'लहर' उठे हुए पानी की संज्ञा मात्र है। इसकी संरचना में केवल पानी ही पानी है। एक दिन लहर ने सोचा चलो देखते हैं जिस सागर में हम पैदा हुई उसके भीतर क्या है। यह देखने के लिये उसने भीतर गोता लगाया तो उसे पता लगा कि वह अपना अस्तित्व ही खो चुकी है लेकिन उसका पानी अभी भी पानी ही है। उसने जो खोया वह केवल अपना नाम 'लहर' खोया है, उसने अपनी संज्ञा भर खोई है। वह पानी में जाकर पानी हो चुकी है। देखा जाए तो सागर भी पानी ही से है और लहर भी पानी ही से है।यही पानी सागर भी है, इसकी हर बूँद पानी ही से है, यही एक लहर में भी है, यही सारी लहरों में है। हमने लहरों के नाम और विशेषण बना लिये जैसे छोटी, बड़ी, सुनामी आदि आदि।
मैं भी उस महा सागर की एक लहर हूँ, तुम भी, सभी। हम सब में वही पानी है। हमारे नाम किसी और ने रख दिये हैं। अपने भीतर जा कर मैं जो देखूँगा तो मैं जिसमें मिल जाऊँगा वह वही है जिसमें तुम भी मिलोगे।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति।। गीता ६/३०।।
जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है उसके लिए न तो मैं कभी अदृश्य होता हूँ और न वह मेरे लिए अदृश्य होता है।
रामनारायण सोनी
[30/01, 21:49] Ramnaraysn Soni: लघु काल-चिन्तन ४९
"अभ्यास कैसे करोगे?"
जो भी तुम स्वयं में स्थित होने के लिए करते हो, वही अभ्यास है। मन इसी वर्तमान पल में आ जाए हाँ इसी क्षण में तब वह अभ्यास है। भूतकाल की स्मृतियाँ छोड़ कर मन को वर्तमान क्षण में लाने के लिए जो प्रयास है, वही अभ्यास है। तो करना सिर्फ यह है कि इस अभी मन में कहीं कोई तर्क वितर्क तो नहीं, संकल्प-विकल्प की उठापटक में तो नहीं लगा है। यह निश्चय करो कि मन की कोई रूचि न हो।
पूर्ण सजगता से मन सब ओर से सिमट कर इसी पल से जुड़ जाए लेकिन ध्यान रखो कि मन कुछ देखने, सुनने, सूंघने, स्पर्श करने और कुछ समझने के लिए उदासीन हो जाए। जैसे ही इस वर्तमान क्षण में पहुँचे, समझो यही 'अभ्यास' है। परन्तु अपने अभीष्ट के प्रति जाग्रति रखे बगैर अभ्यास का कोई लाभ नहीं होगा।
मन जब अन्त:करण में उतर जाता है तब वह मन नहीं रहता। मन अपने अन्तःकरण की ऊपरी परत है। जैसे जैसे अपनी जागरूकता बढ़ती है वैसे वैसे अभ्यास बेहतर होता चला जाता है। वर्तमान क्षण में स्थिर होने के लिए, प्रयास अभ्यास है। हो सकता है इस प्रक्रिया में समय लगे। हम अक्सर कुछ थोड़ा सा सीखते हैं और छोड़ देते हैं, फिर कुछ समय बाद शुरू करते हैं।
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ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥ १७ ॥
वह परब्रह्म ज्योतियों की भी ज्योति एवं माया से परे कहा जाता है । वह परमात्मा बोधस्वरुप, जानने के योग्य एवं तत्त्वज्ञान से प्राप्त करने योग्य है और सब के हृदय में विशेष रुप से स्थित है ।
[30/01, 21:50] Ramnaraysn Soni: लघु काल-चिन्तन ४८
"समस्त तेजोमयं विश्वम्"
तुम्हारे घर के दरवाजे में आग है, जो कपड़े पहन कर बैठे हो उसमें आग है, किताबों में आग है, तेल में आग है, एल.पी.जी. में आग है। यह आग तुम्हे दिखाई नहीं देती अर्थात् अप्रकट है जैसे ही उपयुक्त घर्षण अथवा जब दूसरी आग आ कर मिलती है यह प्रकट हो जाती है। आई हुई आग लौट भी जाए तो यह आग अपने आश्रय को जलाती रहती है। तात्विक रूप से यह आग ही पंचतत्वो में से एक 'अग्नि' तत्व है। आपको आश्चर्य होगा कि संसार के हर पदार्थ में आग है। विज्ञान अर्थात् पदार्थ विज्ञान ने इसे सिद्ध किया है। आग की उपस्थिति को ताप के रूप में थर्मामीटर से नापा जा सकता है जिसे तापक्रम या टेम्प्रेचर कहते हैं। एन टी पी याने नार्मल टेम्प्रेचर एण्ड प्रेशर। नार्मल टेम्प्रेचर मतलब वातावरण का तापक्रम। जितना अधिक ताप उतनी अधिक मात्रा में आग। फ्रिज इसी तरह की आग को उस वस्तु से बाहर निकाल कर फेंकता है। परमताप -273 डिग्री होता है। फिर भी परमाणु की ऊर्जा विद्यमान रहती ही है। हमारे शरीर के कण कण में भी यही आग है जो अग्नि तत्व है।
खैर, अध्यात्म में इस 'अग्नि' को देव कहते हैं। इस देवता में ज्वलन क्षमता भी स्वयं की नहीं है। वह ब्रह्म ही है। उक्त रूपकों के माध्यम से स्पष्ट है कि 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म'। मैं ही नहीं संपूर्ण जगत में ब्रह्म व्याप्त है। तो मैं भी कहूँ कि "अहं ब्रह्मास्मि"। तुम भी यही कहो। अपने आत्मदीप की परमज्योति का आभास करो।
'ईशावास्यमिदं सर्वम्"
रामनारायण सोनी
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[31/01, 03:30] Ramnaraysn Soni: आत्मदीप
लघु काल-चिन्तन ७१
"आज का दिन हमारा है"
यों तो हर दिन मेरा अन्तिम दिन है पर हर रोज की तरह आज की सुबह भी मेरी प्रथम सुबह है।
और इसलिये...
मैं इस आज को फिर से जीना प्रारंभ करूँगा। मेरे भीतर आनन्द का सागर ठाठें मार रहा है इसलिये बाहर मेरे अच्छे मुस्कुराते प्रियजन हैं।
जब बाहर की खुशी और भीतर का आनन्द गले मिलते हैं तो जीवन के काले सफेद पन्ने रंगीन हो उठते हैं। कस्तूरी में केसर मिल जाती है। स्वर्ण सुगन्धित हो उठता है। यही बाँटता हूँ सब ओर। देखो मेरे हाथ भी रंगीन हो गये हैं। मैं रजनीगंधा का फूल क्या ले आया एक मोहक सुगन्ध पीछे पीछे चली आयी जिसे तो बाँटने की भी जरूरत नहीं पड़ी, प्रकृति ने ही बाँट दिया। हृदय की सुनसान वीथियाँ वाचाल हो उठी, रोम कूपों की अट्टालिकाएँ कैसी स्फुरित हो उठी हैं। और देखो! तुम जो मुस्कुराए तो यह मुस्कुराहट कैसी संक्रामक हो गई है। रोकना मत यह इस छोर से उस छोर तक चली जाएगी। दूर क्षितिज पर कुछ अनमनी, कुछ उदास जिन्दगियाँ खड़ी हैं उन तक इसे पहुँचाना जरूरी है। आने वाली रात अँधियारा नहीं एक विश्रान्ति ले कर आवेगी। कल फिर एक तरोताजा सुबह होगी। हम सब की सुबह।
आज का दिन मेरा दिन है, आज का दिन तुम्हारा दिन है। मैं और तुम मिल कर 'हम' बने हैं। तो हम सिर्फ वर्तमान पर टिकें, जी भर कर जियें।
चलें?
आओ चलो! हम चलें!!
रामनारायण सोनी
१३.१२.२०२०
[31/01, 03:31] Ramnaraysn Soni: आत्मदीप
लघु काल-चिन्तन ७४
प्रकृति और परमात्मा के विधान
लोग कहते हैं ज्वार भाटे और तूफान तबाही लाते हैं, बना बनाया कुछ मिटा जाते हैं। हवाएँ चलती हैं तो बगूले धरती की धूल को आसमान पर चढ़ा जाती है। बारिशें बहुत कुछ बहा ले जाती है। तापमान बढ़ता है गर्मियों में तो पसीना आता है, लगता है शरीर निचुड़ गया। पतझड़ वाले वन गर्मियों में नग्न हो जाते हैं। आदमी दुःखी होता है तो आँखें पनीली हो कर बहने लगती है। सोच सोच कर लगता है कि जगत विसंगतियो से भरा है। प्रकृति और परमात्मा के विधान में यह विकृति क्यों है?
हमे इसका दूसरा पहलू भी देखना होगा। ज्वारभाटे समुद्र में से खाद्य सामग्री निकाल कर किनारे पर बसने वाले पशु-पक्षियों को परोस जाते हैं और हमारी मचाई उसे बहा कर ले जाते हैं और किनारों को धो कर लौट जाते हैं। उस भूमि का कचरा कौन झाड़ेगा जो न हमारी है न तुम्हारी। इस धूल को हवा ले जाकर वनस्पति के अपशिष्ट में मिला कर मृदा बनाएगी। नदियों, नालों और पोखरों को हमने गन्दगियों को हमने पाट दिया पर बारिश इस बहा कर ले जाएगी। हमारे शरीर से बहता पसीना सिर्फ खारे पानी का निकास नहीं है वह उस तरकीब से प्रकृति हमारे भीतर से टॉक्सिक मेटर बाहर फेंकती है। पतझड़ पेड़ों को सिर्फ निर्वस्त्र करने नहीं आता है यह न हो तो फिर बसन्त में नव कोंपलें कैसे जन्म लेंगी। मनोवैज्ञानिक कहते हैं अत्यन्त अवसाद के क्षणों में यदि व्यक्ति रो नहीं पाता है तो मृत्यु तक सम्भाव्य है। वस्तुतः प्रकृति का अपना विधान और उसकी प्रक्रिया समस्त जगत के सन्तुलन और भिन्न भिन्न जीवों का पोषण भी करती है। हमें उससे अधिक छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिये।
रामनारायण सोनी
२.१.२१
[31/01, 03:32] Ramnaraysn Soni: आत्मदीप
लघु काल-चिन्तन ७५
माटी का सौंदर्य
वही मिट्टी, वही चाक, वही कुम्हार और उसके वही हाथ पर कभी क्या तो कभी क्या बनता है। कैसे बनता है? यह प्रकृति के साँचों का नियम है। क्यों बनता है? यह कुम्हार का मन है। कुम्हार के हाथ वही करते हैं जो उसका मन कहता है। मिट्टी तो लौंदा भर है। चाक पर नहीं चढ़ी तो बह जाएगी एक दिन तेज बरखा में। चाक पर चढ़ना है तो कुम्हार के हाथों पड़ना होगा। सूखी मिट्टी कुछ न बन सकेगी उसे गीला और स्निग्ध होना पड़ेगा। अपनी ही कीली पर घूमते चाक तो बस कालचक्र की तरह वह घुमाता भर है। ध्यान से देखो कुम्हार की महीन गीली उँगलियों का स्पर्श चाक पर घूमती मिट्टी को आकार दे देती है और फिर वे अलग हो जाती है। समय आने पर कच्चे बिम्ब मैं कुम्हार रंग भरता है। आग में तपाता है।
गुरू मेरा कुम्हार है मैं उसकी मिट्टी हूँ। उस कुम्हार ने उसके मन और कर्म से जो आकार और स्वरूप दिया है यह मेरा नहीं उसका कमाल है। तुम तो बस इस बने हुए मुझ पात्र पर रीझ रहे हो। तारीफ तो उस कुम्हार की होनी चाहिये।
जीवन में एक स्वस्थ सुन्दर मन वाला कुम्हार जरूरी है, सदगुरु साहिब सा। तुम तो बस तैयार रहो उसके चाक पर घूमने के लिये।
रामनारायण सोनी
११. १. २१
[31/01, 03:34] Ramnaraysn Soni: आत्मदीप
लघु काल-चिन्तन ७६
'बीच में खड़े हो जाओ'
तुमने घट्टी शायद देखी ही नहीं क्योंकि यह लगभग विलुप्त सी हो गई है। घट्टी मतलब हाथ से पीसी जाने वाली चक्की। घट्टी के दो पाट होते हैं। एक घूमता है दूसरा गड़ा रहता है। घूमता है एक कीली पर बीच में लकड़ी की मकड़ी। मकड़ी के अगल-बगल से दाने अन्दर जाते हैं। जो दाना कीली के पास टिका रहा बस साबुत वही बचा बाकी सब पिसे।
जगत की घट्टी में बहुत तरह के पाट है। जैसे कि 'सुख-दु:ख' - बीच में खड़े हो कर देखो। यह जोड़ा जगत से परमानेन्ट जुड़ा है। जब तक दुनिया है यह रहेगा ही। परन्तु घट्टी की कीली के पास टिके रहोगे तो पिसने से बच जाओगे। सावधानी हटी कि दुर्घटना घटी। सुख में दुःख के वापस नौट आने का डर और दुःख में सुख न मिल पाने का अवसाद दोनों अवस्थाओं में केवल कष्ट है। कष्ट से बचना हो तो तटस्थता रूपी कीली के पास खड़े रहो। तुम देखोगे कि कई और दाने आते हैं और पिसने चले जाते हैं।
राग-द्वेष, मान-अपमान, जय- पराजय, सुख-दु:ख आदि की अवस्था मे रह कर एक साक्षी की तरह बीच में खड़े रह कर देखो। इस तरह सम भाव से रहने पर जीवन के हरेक पड़ाव में समान स्थिति में रहना ही समत्व योग है।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥३२॥
श्री कृष्ण कहते है कि हे अर्जुन! सुख हो या दुःख, जिसका समभाव डिगता नहीँ. ऐसे योगी को परम योगी माना गया है।
रामनारायण सोनी
१५.०१.२१
[31/01, 03:35] Ramnaraysn Soni: आत्मदीप
लघु काल-चिन्तन ७९
"वाणी का खर्च कम करें"
ईश्वर ने हमारी देह रचना करते समय हमारे सिर में दो आँख, दो कान और नाक के दो छिद्र और मस्तिष्क दो भागों में दिये हैं लेकिन जीभ एक दी है। इसका संकेत यह है कि हम देखने, सुनने, गंध ग्रहण करने और सोच-विचार अधिक करें और जीभ अर्थात् स्वाद में मिताहारी हों और मितभाषी हों अर्थात् स्वाद के चक्कर में अधिक न खाएँ और आवश्यकता से अधिक न बोलें। ऋषि प्रार्थना करता है कि
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवागँसस्तनूभिः
व्यशेम देवहितं यदायूः।।
हमारी वाणी का चार स्थान हैं परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी। लेकिन वाणी के लिये ऋषि की प्रार्थना है-
ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमावीरावीर्म एधि।
वेदस्य म आणिस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीरनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यृतम् वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि तन्मामवतु तद्वक्तारमवत्ववतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
भावार्थ:-
मेरी वागिन्द्रिय मेरे मन में स्थित हो और मन वाणी में स्थित हो अर्थात मेरी वागिन्द्रिय और मन एक-दुसरे के अनुकूल रहें)। हे स्वप्रकाश परमात्मन् ! तुम मेरे समक्ष अविर्भूत होओ ।
(हे वाक् और मन ! ) तुम मेरे प्रति वेद को लाओ । मेरा श्रवण किया हुआ मेरा परित्याग न करे । अपने इस अध्ययन के द्वारा मैं रात और दिन को एक कर दूँ।
मैं ऋत (वाचिक सत्य) का भाषण करूँ और सत्य (मन में निश्चय किया हुआ सत्य) बोलूँ ।
वह ब्रह्म मेरी रक्षा करे; वह वक्ता की रक्षा करे । वह मेरी और वक्ता की रक्षा करे ।
त्रिविध ताप की शांति हो ।
आँखों से, कानो से देखा सुना जा कर मन में पहुँचता है और उसे पुनः आवश्यकता पड़ने पर वाणी परा से अर्थात मन से चल कर मुख से वैखरी रूप में प्रकट होती है। जैसे देखे हुए यात्रा वृत्तान्त को बोल कर सुनाता है अथवा सुने हुए किसी गीत को अपने मुँह से सुनाता है। मन में संचित उन कोषों को बाहर लाने में व्यक्ति की अपनी आन्तरिक ऊर्जा का विस्तारण होता है इसलिये ऊर्जा के इस खर्च में मन और मस्तिष्क दोनों थकते हैं।
कम से कम बोले- स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें।
रामनारायण सोनी
२५.०१.२१
[31/01, 03:37] Ramnaraysn Soni: आत्मदीप
लघु काल-चिन्तन ८०
*"वृद्ध कौन हैं?*"
वृद्ध का अर्थ बूढ़ा कभी नहीं है। वृद्ध संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ है जो अभिवृद्धि को प्राप्त हुआ है। जैसे जो बुद्धि को प्राप्त हो गया वह बुद्ध है। वृद्ध से तात्पर्य है- वृद्धि शरीर की, वृद्धि रिश्तों की सघनता की, वृद्धि मेधा की, और इससे भी अधिक "वृद्धि अनुभव की"। बूढ़ा शब्द वैदिक वाङ्मय का शब्द नहीं है।एक बात अौर है। जिसको अधिक उम्र का संकेत किया गया है वह एक अवस्था है जिसे जरावस्था कहते हैं। उर्दू में इसे ज़ईफ़ कहते हैं। यह अवस्था शरीर की अवस्था है, व्यक्ति की नहीं। जरावस्था अर्थात जिसका शरीर जर्जर हो गया हो, क्षीण हो गया हो। व्यक्तित्व की अवस्था नहीं है। हमारे अवचेतन पर हमने छाप अंकित कर रखी है कि वृद्ध वह है जो जीवन की सक्रियता से दूर चला गया है, जो लाठी के सहारे जीवन ढो रहा है, जो कदाचित् उत्त्साहहीन है और न जाने क्या क्या। शरीर की किसी प्राकृतिक क्षीणता को मन पर भारी मत पड़ने दो। गीता कहती है कि मन आत्मा और जीव की तरह अविनाशी है। और इसलिये मन की उम्र नहीं होती। मन चाहे तो अभी इसी हाल तुम्हें बच्चा बना सकता है। छोटे छोटे बच्चों के साथ बच्चा बन कर खेल सकते है। शरीर की अवस्था से मन की अवस्था को अलग रखो क्योंकि मन आपका अपना कल्पवृक्ष है। पूज्यपाद स्वामी अवधेशानन्द गिरी कहते हैं चाहे कुछ और समझ लेना पर खुद को बूढ़ा मत समझना।
मन की धनात्मक ऊर्जा का रूपान्तरण शरीर को सम्बल देती है। वेद कहता है-
सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान् नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव। हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥६॥
अर्थ: जो मन मनुष्य को अपनी इच्छा के अनुसार उसी प्रकार घुमाता है, जैसे कोई अच्छा सारथि लगाम के सहारे वेगवान् घोड़ों को अपनी इच्छा के अनुसार नियंत्रित करता है; बाल्य, यौवन, वार्धक्य आदि से रहित तथा अति वेगवान् जो मन हृदय में स्थित है, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्प वाला हो। इसलिये पूरे मन से "जियो जी भर कर"
रामनारायण सोनी
२६.०१.२१
[31/01, 03:37] Ramnaraysn Soni: आत्मदीप
लघु काल-चिन्तन ८१
"शब्द के बीज"
आम की गुठली से आम, गेहूँ से गेहूँ और धतूरे के बीज से धतूरा ही उगता है। एक बीज अपने मूल प्रकार की तरह का पौधा और अपनी ही तरह के बीज पैदा करता है। वही पानी, वही प्रकाश, वही जमीन वही आकाश, सब कुछ वही पर जो सृजित हुआ वह बीज की तरह अपना-अपना सा है। पितृपौधे के सारे गुण, कर्म, स्वभाव और व्यवहार हू ब हू वैसे के वैसे ही। नीम मीठा और चीकू खट्टा नहीं होगा। यह घटना पूर्णतया नैसर्गिक है। हाइब्रिड कर भी दिया जावे तो जोड़ उनके पेरेन्टल गुणों का ही संयुक्त होगा।
हमारे शब्द भी उगे हुए बीज हैं। जो शब्द हमने स्वीकार किये, उन्हे धारण किया, उनका पोषण किया, हवा पानी दिया वे ही उगे फिर उनसे जो उत्पाद बना वह उन बोये गये शब्दों का सा ही होगा। "बोये पेड़ बबूल के, आम कहाँ से खाय"। हर शब्द का अपना अपना अर्थ है, अपना भाव है, अपना स्वभाव है और अपनी तरह का ही प्रभाव भी उत्पन्न करने की क्षमता है। जैसी सृष्टि चाहो वैसे शब्दों की खेती करो। एक बात और ध्यान रखने की है कि अगर अपने खेत में अच्छे बीज नहीं बोये तो कहीं से उड़ कर खरपतवार के बीज आएँगे और उनकी अवाञ्छित फसल खड़ी हो जावेगी। चलो अच्छे शब्दों के बीज अपने भीतर बोयें और अच्छे विचारों, अच्छे प्रभाव, अच्छी किस्म के शब्दों की फसल उगाएँ। अच्छा बटोरें और अच्छा ही बाँटे।
रामनारायण सोनी
२७.०१.२१
श्री
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