आत्मदीप
लघु काल-चिन्तन ७८
प्रतीति
क्या तुमने गुड़ की मिठास, वंशी की स्वर लहरियाँ, पानी का गीलापन, तुममें जल रहे ताप को देखा है? यदि हाँ, तो जैसी भी आड़ी तिरछी बन सके उसकी तसवीर बनाओ तो मानें। यह सम्भव नहीं है।
एक दिन किसी ने मुझसे पूछा आपने किस विषय में इन्जीनियरिंग किया है? मैंने कहा विद्युतीय में। उसने कहा विद्युत मतलब बिजली, मैने कहा- हाँ। पाँच साल इसी बिजली को पढ़े हो, चालीस साल तक इसी की नौकरी खाते रहे हो तो बताओ बिजली कैसी होती है? दिखाओ भी। मैं अवाक रह गया, नहीं बता सका। वह बोला आज जान कर ही जाऊँगा। मैने केबल के दो तार प्लग में लगाए, स्विच आन कर दिया और उससे कहा दोनो तार पकड़ो। वह समझ चुका था कि विद्युत को जानना है तो उसके जन्य प्रभाव से उसे पहचाना जा सकता है लेकिन फिर भी उसे जाना नहीं जा सकता। वेद ने कहा है "विद्युत ब्रह्मेति"। हमारा हृदय भी आन्तरिक विद्युत तरंगों से धड़कता है। हम धड़कन को महसूस करते हैं। यह प्रतीति है। प्रीति याने 'प्रेम' भी प्रतीति है। ईश्वर भी देखा या दिखाया नहीं जा सकता वह भी प्रतीति है। विवेकानन्द यहाँ वहाँ महापण्डितों के पास भटकते रहे पर अन्त में रामकृष्ण परमहंस उन्हें उस प्रतीति तक ले गए। जानने के चक्कर में न पड़ो ईश्वर तुम्हारे आस पास, तुम्हारे भीतर बाहर मौजूद है। वह सार्वदेशीय, सार्वभौमिक, सर्वकालिक, जगदीश है, जगन्निवास, जगन्नियंता है। उसकी प्रतीति करो। चाँद की चाँदनी पकड़ने की कोशिश मत करो उसकी शीतलता महसूस करो। सर्दी लगे तो धूप को ओढ़ो बिछाओ। जल प्यास नहीं बुझाता उसकी शीतलता प्यास बुझाती है, महसूस करो। प्रेम शरीर से नहीं आत्मा से करो। प्रीति की प्रतीति करो। गुड़ गुड़ कहने से मुँह मीठा नहीं होगा। मिठास की बस प्रतीति करो।
तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके ।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ।।५ ।।ईशावास्योपनिषद्।।
यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्नेवानुपश्यति।
सर्व भूतेषुचात्मानं ततो न विजुगुप्सते।।६ ।।ईशावास्योपनिषद्।।
रामनारायण सोनी
२१.०१.२१
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