Thursday, 23 July 2020

लघु काल-चिन्तन -५

"जीवन को ढलने के पहले ढालो"
तप कर पिघले हुए कंचन को एक साँचा चाहिये आकार पाने को अन्यथा ढेले को न तो कंचन कह पाएँगे न आभूषण। जैसा साँचा वैसा आकार। गलत ढल गया तो फिर तपना और गलना पड़ेगा। एक बात और यह है कि हर मोती पहले पानी की बूँद था पर हर बूँद मोती हुई है क्या? निश्चित ही उसे साँचा चाहिये और एक कालबद्ध, युक्तियुक्त प्रक्रिया चाहिये। पिघले सोने की और बूँद की तासीर है चंचलता। इनकी तासीर बदले कैसे?
सोने की साँचे में और सीपी के गर्भ में बूँद की मौन समाधि लगती है। जहाँ गतियाँ शून्य हो जाती है। आइन्स्टीन के थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी में से गति का मान्य शून्य करें तो ऊर्जा घनीभूत हो जाती है। ट्रान्सफार्मेशन का मुख्य घटक भी यही है कि आन्तरिक ऊर्जा का आउटफ्लो थोड़ा रुक जाय।
तप के साथ उत्तम ध्येय, युक्तियुक्त प्रक्रिया और धारणा की जरूरत है।
इसलिए ए मेरे मीत नियति के आधीन केवल बह नहीं जाना वरन् ढेले से आभूषण, बूँद से मोती बनना है। 
अच्छा रुपान्तरण जीवन में रसात्मकता जगाता है। 
रामनारायण सोनी

देश काल

"आत्मदीप"

*लघु काल-चिन्तन*

देश-काल-परिस्थिति
स्वाति नक्षत्र की बूँद जब जमीन पर गिरे तो धूल में मिल जाती है लेकिन यदि केले पर गिरे तो कपूर, सर्प के मुख मे गिरे तो विष और सीप के गर्भ मे समा जाए तो मोती बन जाती है।
यहॉं देश स्थान है, स्वाँति काल है और धारण करना परिस्थिति का निर्माण होना है। एक बूँद के ट्रान्स्फार्मेशन में अलग अलग परिणाम देश काल और परिस्थिति पर निर्भर है। चोर का चाकू हत्यारा है और सर्जन का चाकू जीवन त्राता होता है।
सीपी को मोती चाहिये इसलिये वह उसे मिली बूँद के खास मौके को भुनाती है और फिर संयम से उसे धारण करती है; लहरों के शोर और सतह की उथल-पुथल से घबराए बिना ही। फिर आत्मसिंचन की ऊर्जा से बूँद को मोती के रूप में ट्रान्सफार्म करती है। आत्मबोध के बिना आत्मसिंचन नहीं होगा।
मौका तो मुझे मिल गया पर जब तक मैं यह न समझ लूँ कि " हाँ! मैं कर सकता हूँ", तब तक मैं कुछ भी नहीं कर सकता।
🚶तो चलो आज कोई अच्छा सा ट्रान्सफार्मेशन करें।

रामनारायण सोनी

सुराही

लघु काल-चिन्तन

चिलम और सुराही
कबीरा लोहा एक है, गढ़ने में है फेर।
ताहि का बखतर बने, ताहि की शमशेर॥

एक दिन मटकी सोचने लगी, कुछ सोच कर कुम्हार  को  धन्यवाद  कहने  लगी।  बोली, मैं तब मिट्टी ही थी। कुम्हार ने चाक पर  चढ़ाई और  कुछ   चिलमें  बना दी।
अचानक उसे  जाने क्या सूझा  उसने वे चिलमें तोड़ दी और फिर चाक पर चढ़ा कर उसी मिट्टी से मटकी बना दी। मटकी कहने लगी कि मैं अगर चिलमें बनतीं तो जाने  कितने  कलेजे  जलाती   पर  अब मटकी हो कर  लोगों  की  प्यास शीतल जल से बुझाती हूँ। मेरे सृजन करने वाले ने कितनी कृपा की है मुझ पर।
    इसी  तरह  मैं भी तो कृतज्ञ हूँ उस पावन
परमेश्वर का जिसने मुझे सँवारने में कसर नहीं छोड़ी। आदमी उसने बना दिया, इन्सान मुझे बनना है। चलो न तुम भी।

        रामनारायण सोनी

लघु काल-चिन्तन १

मेरा मुझ में क्या है?
एक साल के बच्चे को ध्यान से देखा, वह दुनिया के बारे में कितना जानता है? बहुत ही थोड़ा। मैं सोचता हूँ आज मुझ में जो है वह कहीं न कहीं से तो आया है। मनन से पता चला कि दुनियाँ की पहली पहचान माँ ने कराई। आचरण और व्यवस्थापन पिता से, शिक्षा शास्त्र और स्वाध्याय से ज्ञान गुरू से आया, जीवन का एक बड़ा हिस्सा समाज से आया। इन सब से बहुत कुछ आया पर मुझ में रुका केवल वही जो मुझे पसन्द आया। आज मैं जो भी हूँ इस संचय ही से हूँ। अच्छा या बुरा।
लेकिन जो मिला वह पहले था नहीं और इसलिये वह ऋण ही है, जिससे लिया उसका ऋण। क्या ये सारे ऋण बिना चुकाए ही दुनिया से चला जाऊँगा? नहीं ना। आज की इस सुबह ने मुझे कुछ नये काम दे दिये हैं। चलो मेरे संग इसी तरह आप भी, कुछ करें।

रामनारायण सोनी
२९.०५.२०२०

लघु काल-चिन्तन १

मेरा मुझ में क्या है?
एक साल के बच्चे को ध्यान देखा, वह
दुनिया के बारे में कितना जानता है?
बहुत ही थोड़ा। मैं सोचता हूँ आज मुझ
में जो है वह कहीं न कहीं से तो आया
है। मनन से पता चला कि दुनियाँ की
पहली पहचान माँ ने कराई। आचरण
और व्यवस्थापन पिता से, शिक्षा शास्त्र
और स्वाध्याय से ज्ञान गुरू से आया,
जीवन का एक बड़ा हिस्सा समाज से
आया। इन सब से बहुत कुछ आया पर
मुझ में रुका केवल वही जो मुझे पसन्द
आया। आज मैं जो भी हूँ इस संचय ही
से हूँ। अच्छा या बुरा।
लेकिन जो मिला वह पहले था नहीं और
इसलिये वह ऋण ही है, जिससे लिया
उसका ऋण। क्या ये सारे ऋण बिना
चुकाए ही दुनिया से चला जाऊँगा?
नहीं ना। आज की इस सुबह ने मुझे
कुछ नये काम दे दिये हैं। चलो मेरे संग
इसी तरह आप भी, कुछ करें।

रामनारायण सोनी
२९.०५.२०२०

श्री

अनुक्रम    1 अयं आत्मा ब्रह्म  2 विक्षिप्त अथवा मुक्त  3 अद्वैताभास 4 शब्द ब्रह्म 5 जड़ में चेतन और चेतना का दर्शन 6 "समस्त ...