आत्मदीप
लघु काल-चिन्तन १०८
"जीवन का यह क्षण अवसर है"
क्या जीवन का मूल्यांकन कुल ली गई सांसें है, या कि जी गई उम्र है या फिर वे सार्थक क्षण हैं जो जीवन को जीवन्त बना गये। सांसें हमारे जीवित होने की पहचान है पर केवल ऐसा किया जाना जीवन अवमूल्यन है। कुछ दिनों, वर्षों या एक उम्र भर जी लेना भी जीवन का मूल्यहीन रह जाना ही है। जीवन का वास्तविक मूल्य उन क्षणों से है जो हममें गुणात्मक परिर्वतन लाते हैं।
गुरू द्रोण के सभी शिष्यों ने एक समान समयावधि में जो जो सीखा और उसे आत्मसात किया उनमें से अर्जुन ने श्रेष्ठ प्राप्त किया क्योंकि उसने हर क्षण को अवसर में बदल कर अपनी साधना को परिपूर्ण किया। लुहार की मरी खाल से बनी उस धौंकनी की तरह साँसे ले कर छोड़ देने में ही इन क्षणों को बिता दिया तो क्या हासिल होगा? इसी तरह जैसे कपड़े की लम्बाई, पत्थर का वजन, पानी के आयतन की नाप की तरह हमने जीवन को नाप भर लिया तो हमारी उम्र भी जीवन की नाप जरूर है पर यह जीवन को सार्थकता और सफलता के मुकाम पहुंचाने में पर्याप्त नहीं है। रास्ते में गड़े पत्थर की उम्र भी हम से अधिक है। वस्तुतः हर उपलब्ध क्षण की उपयोगिता होने पर जीवन में सकारात्मकता लाई जा सकती है। किसी अवसर भरे क्षण को खोना जीवन का अवमूल्यन ही है क्योंकि समय की गति इर्रिवर्सिबल है। हम उस व्यतीत अतीत में झाँक तो सकते हैं पर उसमें लौट कर जा नहीं सकते। हर क्षण उस परमेश्वर का अनुपम उपहार है इसे व्यर्थ न गवाएँ, इस पल को उस अर्थ में जी कर कुछ अच्छा कर जाएँ।
रामनारायण सोनी
०३.०३.२१
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