Wednesday, 24 February 2021

अवचेतन में अच्छे स्वप्न भरें

आत्मदीप

लघु काल-चिन्तन १०४

"अवचेतन में अच्छे स्वप्न भरें"

हमारा चेतन मन जगत से जुड़ा है लेकिन नेपथ्य में कार्य कर रहे अवचेतन को यही प्रोग्राम करता है। हमें कार चलाना सीखना है तो कोच हमें सिखाता है स्टीयरिंग, क्लच, एक्लरेटर, ब्रेक, गीयर आदि का प्रयोग कब कब किस किस तरह करना है? यह सब सीखने का कार्य चेतन मन का है। फिर इस पूरे प्रोग्राम का लोडिंग अवचेतन में हो जाता है तो ड्राइव करने वाला गाने भी सुनता है, साथ बैठे व्यक्ति से बात भी करता है साथ ही वह गाड़ी भी पूरी कुशलता से चलाता रहता है। अवचेतन का सम्पूर्ण प्रोग्रामिंग चेतन मन ही करता है। दूसरे शब्दों में कहें तो हम गम्भीरता से अपने मन में जो विचार करते हैं वह अवचेतन को प्रोग्राम करता ही रहता है और हमें पता तक नहीं चलता। हमने नकारात्मक सोच बनाई तो अवचेतन में वही प्रोग्रामिंग हो गया और सकारात्मक सोच बनाई तो ऐसा ही अवचेतन मोल्ड हो जावेगा। हम अपने अपने कल्पवृक्ष के तले बैठे हैं। ऐसा तुरत-फुरत सम्भव नहीं है पर धीरे धीर सतत चलने वाली प्रकिया यही है। सोये सोये देखे जाने वाले सपनों की हम यहाँ बात भी नहीं कर रहे हैं। जागते हुए देखे गए सपने आपके भविष्य के निर्माता हैं। ये सपने अवचेतन में अगर ठीक से बैठ गए और इनका प्रोग्रामिंग फुल इन्टेन्सिटी से हो गया तो ये सपने आपको सोने नहीं देंगे। जरूरी नहीं कि वे पूरी तरह या आंशिक रूप में साकार हों। यह बात भी तय शुदा है कि बिना सपने के कोई भी आकार पाना असम्भव है।
साइकिल रिपेयरिंग करने वाले राइटबन्धुओं ने अपने अवचेतन को रोज प्रोग्राम किया कि उन्हें उड़ने वाली मशीन बनानी है भले ही उन्होंने एरोनॉटिक्स इन्जीनियरिंग नहीं पढ़ी हो। आखिर एक दिन उन्होंने यह करिश्मा कर दिखाया। हमारे पूर्व राष्ट्रपति, मिसाइल मेन अब्दुल कलाम ने बड़े-बड़े स्वप्न देखे और एक दिन वे साकार हो कर जमीनी धरातल पर साकार हो कर उतर आये।
"चलो कुछ अच्छा हो जाए !"

रामनारायण सोनी
२४.०२.२१


https://youtu.be/w22yb4hfmDI?t=379

Friday, 19 February 2021

अमर आत्मा सच्चिदानन्द मैं हूँ

आत्मदीप

लघु काल-चिन्तन १०१

"अमर आत्मा सच्चिदानन्द मैं हूँ"

सागर की उठती गिरती लहरें कह रही है कि समुद्र में लहरों की यात्रा अब भी अनवरत चल रही है। लहरें बीच सागर में जन्मती है, दूसरी लहरों के संग संग दौड़ती हैं, उछलती कूदती हैं, अठखेलियाँ करती हैं। सारी लहरें किनारे की और दौड़ती हैं और इनकी ये दौड़ें किनारे पर आ कर समाप्त हो जाती हैं। दौड़ती लहरें ही अलग अलग दौड़ते जीवन हैं। लहरें पानी पर चुपचाप खड़ी नहीं रह सकती हैं उसे दौड़ना ही पड़ेगा। रुकने का अर्थ है लहरों का बीच में ही मर जाना। हर लहर में पानी है वही सागर का पानी। गौर करें तो इस उठते गिरते पानी की वर्तमान पहचान, वर्तमान संज्ञा ही लहर है। इस उठते, गिरते, चलते पानी का नाम हमने दिया है 'लहर'। लहर जब अपनी यात्रा सम्पूर्ण कर के किनारे पर आ कर मर जाती है तो असल में वह फिर से अव्यक्त हो जाती है। उसका पानी समुद्र का ही पानी है। न वह पहले अलग था और न ही अब अलग हुआ है। इस लहर का नाम हम जो चाहे रख लें, जैसे 'सुनामी' आदि। अपनी पहचान भी शारीरिक संज्ञान से है वस्तुतः लहर के पानी की तरह पर हम सभी में वही एक अमर आत्मा मौजूद है अर्थात् हर एक के मूल में तात्विक रूप से 'मैं' ही अद्वैत विशुद्ध आत्मा हूँ, यहाँ भी, वहाँ भी, सब जगह मैं ही हूँ। 

रामनारायण सोनी
१९.०२.२१


Thursday, 18 February 2021

जीवन में विकास के ढाँचे

आत्मदीप

लघु काल-चिन्तन १००

"जीवन में विकास के ढाँचे"

हमारे बचपन में हम कोरे कागज़ की तरह थे। हर दिन इच्छाएँ, भावनाएँ, आशाएँ और संकल्पनाएँ जुड़ती चली गई।
इच्छाएँ एकदम नेचुरल हैं उन्हें कोई रोक नहीं सकता  इच्छाएँ कुछ पूरी हुई होती हैं और कुछ अधूरी ही रह जाती हैं। 
भावनाएँ कहीं जीवन को रसात्मकता में डुबो गई तो कहीं रिश्तों को जोड़ तोड़ गई परन्तु ये न होती तो आदमी पशु के समान होता, वह पशु जो अपने समूह में से किसी के मर जाने पर भी चरता फिरता है। भावनाएँ अन्तःकरण का जुड़ाव है। कभी यह आकर्षण है तो कभी विकर्षण परन्तु ये भावनाएँ ही जीव जगत में मनुष्य को श्रेष्ठतम बनाती हैं। भावना का सबसे बड़ा प्रॉडक्ट है सम्वेदना, फीलिंग। तुम्हारा दुःख जब मेरा अपना लगे तब मैं समझूँगा कि मेरा तुम्हारा अन्त:करण स्ट्रॉन्ग बॉण्डेज में है। यदि मुझे खुशी मिली है और मैं तुम्हे उसमें शामिल करना चाहूँ तो भी ऐसा ही है। मेरी भावनाएँ परिशुद्ध हैं तो ही मैं तुम से प्रेम कर पाऊँगा। अन्यथा नकली चढ़ाया मुलम्मा जिन्दगी भर नहीं चलता है।
आशाएँ अमर धन हैं। आशाएँ जीवन की रेल की पटरियाँ हैं जिन पर जीवन दौड़ता है। मरी आशाएँ लेकर कंकाल को ढोना निरर्थक है। पर आशाएँ अतृप्त अपेक्षाएँ न बने उसमें पुरुषार्थ के संवाहक लगे रहें।
संकल्पनाएँ दो महान प्रक़म से जुड़ी हैं एक संभावना और दूसरे स्वप्न। सम्पूर्ण मानवता का विकास इन्ही काँधों पर चलता है। आदमी पहले संभावना टटोलता है फिर उन पर आधारित देखे गए स्वप्नों को साकार करने में लग जाता है। ये दोनों जरूरी है अन्यथा उस एक चप्पू वाली नाव की कल्पना कर लो जो सतत चलने पर भी किनारा नहीं छोड़ पाती है।
इच्छाएँ, भावनाएँ, आशाएँ और संकल्पनाएँ जीवन के आवश्यक और अनअवाइडेबल परिस्थितियों का निर्माण करती हैं पर इन घटकों से ही जीवन की पूर्णता है। इन्हें सन्मार्ग की ओर मोड़ दें। विवेक का आत्मदीप जलाए रखें।

रामनारायण सोनी
१९.०२.२१

Tuesday, 16 February 2021

मन से ही व्यक्तित्व बनेगा

आत्मदीप

लघु काल-चिन्तन ९९

"मन से ही व्यक्तित्व बनेगा"

पहले एक विज्ञापन प्रसिद्ध हुआ करता था- "उसकी साड़ी मेरी साड़ी से सफेद क्यों?" यह विज्ञापन जिसने भी बनाया उसका उद्देष्य अपने प्रॉडक्ट का व्यापार बढ़ाने के लिये था। जो भी हो उसने मानव के मस्तिष्क का और सोच का अध्ययन जरूर किया होगा। यह सोच दो कारणों से हो सकती है, एक प्रतिस्पर्धा और दूसरा ईर्ष्या। प्रतिस्पर्धा स्थस्थ मन की पहचान है और विकास का उत्तम मार्ग है लेकिन ईर्ष्या एक न एक दिन पतन पर जरूर ढकेल देगी। लेकिन श्रेष्ठतम मार्ग है मेरे अपने तरीके से प्राप्त की गई निरभिमानी स्वच्छ सफेदी। यह मार्ग सत्व गुणी है। प्रतिस्पर्धा रजोगुणी है और ईर्ष्या तमोगुणी है। सम्पूर्ण प्रकृति में देश काल की सीमाओं के परे प्रत्येक मानव में भी ये तीनों गुण हमेशा विद्यमान है और जिस समय जो डोमिनेटिंग होगा व्यवहार वैसा ही होगा। अधिक समय तक जो व्यवहार में रहेगा वह आचरण में आ जावेगा। आचरण जैसा जैसा होता जाएगा वैसी वैसी आदत बनती जाएगी। आदतें व्यक्तित्व का निर्माण करती है और ठीक वैसी ही हमारी पहचान बन जाती है।
अब समूची प्रक्रिया को शुरू से आखिर तक फिर से देखें तो स्पष्ट दिखाई देता है कि व्यक्तित्व का निर्माण सोच से होता है। मजे की बात यह है कि सोचना मन का धर्म है। मन जहाँ चाहे वहाँ ले जाता है। मन में आया कि लडडू खाना तो लड्डू के पास दौड़ाएगा, मूवी देखना है तो सिनेमा हाल तक दौड़ाएगा, भगवान के दर्शन करना है तो मन्दिर ले जाएगा और अधिक ध्यान से देखें तो हम वही सब करने में लगे हैं जो कि मन हम से करवा रहा है। इसलिये मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि - "मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो।" ऋग्वेद की ऋचा यही कहती है --
सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान् नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव। हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥६॥

अर्थ: जो मन मनुष्य को अपनी इच्छा के अनुसार उसी प्रकार घुमाता है, जैसे कोई अच्छा सारथि लगाम के सहारे वेगवान् घोड़ों को अपनी इच्छा के अनुसार नियंत्रित करता है; बाल्य, यौवन, वार्धक्य आदि से रहित तथा अति वेगवान् जो मन हृदय में स्थित है, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्प वाला हो।

रामनारायण सोनी
१७.०२.२१

Monday, 15 February 2021

कड़वे सवालों के मीठे जवाब

आत्मदीप

लघु काल-चिन्तन ९८

"कड़वे सवालों के मीठे जवाब"

मैं भी कभी कभी बड़ी अजीब हरकतें करता हूँ। मैं जवाबों में सवाल ढूँढता हूँ मुझे वहाँ जवाब मिलने लगते हैं। मैं खारे समुन्दर में मीठा पानी ढूँढता हूँ। क्या मिलेगा ठण्डा मीठा पानी? पर जवाब मुझे मिल जाता है, हाँ मीठे पानी के बादल का स्रोत यही है। मुझे ऊँचे पहाड़ों की गर्मी से तपी चट्टानों पर प्यास लगी। क्या यहाँ ठण्डा पानी मिलेगा? अचानक मुझे चट्टानों के बीच से झरझर करता शीतल पानी मिल जाता है। एक पौधे में मुझे काँटे ही काँटे दिखे, मैं फूल ढूँढ़ने लगा। मुझे गुलाब मिला। उस तालाब की तलहटी में बस कीचड़ ही कीचड़ था। क्या यहाँ कुछ अच्छा मिलेगा? वहाँ खूबसूरत हरियाए पत्तों की गोद में खिला कमल मिला, उस पर मंडलाते भँवरों का संगीत मिला, खुशबू मिली सौन्दर्य मिला। रेगिस्तान की दिन भर तपी धरती पर उतरती शाम में सुकून ढूँढा तो सुनहरे टीले की हथेली पर सूरज एक गेंद की तरह सजा बैठा था, केक्टस के सुर्ख फूल मुस्कुरा रहे थे।
उसकी हर अटपटी बात में मैंने कई अटपटे सवाल ढूँढे पर उन सवालो के खुद ब खुद जवाब मिले। मैं हैरान था कि कितनी ऋणात्मकता में भी सकारात्मक जवाब भरे पड़े हैं। मैं छोटी छोटी परेशानियों से घबरा जाता हूँ पर शायद वहीं कहीं आसपास उनके सुन्दरतम हल मौजूद होंगे, मैंने ध्यान से देखा नहीं। "नहीं हुआ" यह मेरी समस्या नहीं है, समस्या यह है कि "मैने किया नहीं"। उसने खारा समुन्दर मीठे पानी की सप्लाइ के लिये बनाया है। मेरे सवाल गलत हो सकते हैं पर गौर से देखो! उसके जवाब बहुत सुन्दर हैं, सटीक हैं। शायद नाजुक गुलाब की सुरक्षा के लिये काँटे तैयार किये होंगे। मैं अन्धाकार से परिपूर्ण गर्भ में उल्टा लटका पड़ा था तब मेरा पोषण और संवर्धन उसी ने किया। परमात्मा बड़ा दयालु है।

रामनारायण सोनी
१५.०२.२१

Sunday, 14 February 2021

जीवन नदी है, बहती नदी

आत्मदीप

लघु काल-चिन्तन ९६

जीवन नदी है, बहती नदी

मै जीवन हूँ एक नदी की तरह। हाँ! बहती हुई नदी। कठोर चट्टानों की कोख से जन्मा हूँ। जन्म मेरा प्रारम्भ और मृत्यु है सागर में अपनी अस्मिता का विसर्जन। जन्म होते ही चल पड़ा हूँ, चलना है काम मेरा। मेरी यात्रा तटों की सीमाओं से आबद्ध है। कई सहायक जल स्रोत आ आ कर मेरे आकार और सामर्थ्य को बढ़ाते हैं। मेरा स्वभाव सपाट बहना है लेकिन अवरोध आने पर मैं अपना मार्ग बदल लेता हूँ फिर भी मार्ग में चट्टान सी आई बाधा को तोड़ता हुआ आगे बढ़ता जाता हूँ। मैं नदी हूँ, रुक नहीं सकता। मेरा नैसर्गिक गुण है अपने पानी से प्यास बुझाना, प्यासे जीव-जन्तुओं की, प्यासी धरती की, प्यासे वनस्पति पेड़ पौधों की। लोगों! आओ!! मेरे सुहाने तट और इस पर बने घाट तुम्हें शीतलता प्रदान करेंगे। अपनी प्यास मुझे दे दो, बदले में मुझसे शीतलता ले जाओ। तुम्हारी प्यास मैं सागर को सौंप दूँगा वह अपने बादल भेज कर तुम्हारी प्यास फिर बुझाएगा। तुम प्यास लिये पैदा हुए हो और मैं तृप्ति। मैं नदी हूँ, बहती नदी।
तुम्हें सागर से मिलना है तो आओ! हम संग चलते हैं। मेरा पानी यदि किसी ने मैला न किया तो वह पारदर्शी ही रहेगा। आओ! मुझमें डुबकी लगाओ और तरोताजा हो जाओ पर अगर तुम तैरना नहीं जानते हो तो अपनी नाव ले आओ। संग चलो मैं तुम्हें अपने सुहाने घाट, तट, तट के तमाल, रसाल, शीशम, आम, जामुन के वृक्ष दिखाता हूँ। मैं नदी हूँ, बहती नदी।
तुम्हें यहाँ लोग मेरे सीने और बाजुओं से रेत मिट्टी खोदते हुए दिख जावें तो क्षोभ में मत पड़ना क्योंकि यह प्रक्रिया युग-युगान्तर से चल रही है। मैं नदी हूँ, बहती नदी।
मैं रुक गया तो बीच में ही मृत्यु है, बँध गया तो नई ताकत हूँ, चल पड़ा तो फिर नदी हूँ। छोटे मुझमें आ कर मिलते हैं मैं फिर छोटा बन कर अपने विशाल सागर में समा जाता हूँ। मेरा पानी फिर बादलों की पीठ पर चढ़ेगा, फिर लौटूँगा नदी बन कर। फिर वही नदी, बहती नदी।
जीवन चलने का नाम है। वेद कहता है "चरैवेति। चरैवेति।।"

रामनारायण सोनी
१३.०२.२१

रूपान्तरण बीज का

आत्मदीप

लघु काल-चिन्तन ९७

"रूपान्तरण बीज का"

हर लकडी में आग है, हर फ्ते में नमी है, हर फल में ऊर्जा का भंडार है। लकड़ी में आग आई कहाँ से। तात्विक रूप से लकड़ी में कार्बन है। यह कार्बन पेड़-पौधों द्वारा जमीन के भीतर से खींचा हुआ नहीं है बल्कि हवा में से आयातित है। इस प्रक्रिया में शामिल है प्रकाश संश्लेषण। प्रकाश कुछ करता नही है बस उसकी मौजूदगी में पेड़-पौधों की पत्तियाँ हवा में से कार्बन तोड़ कर अपने पास रख लेता है और बाकी सब हवा को वापस लोटा देता है। तुम मोटे तौर से सिर्फ इतना ही जानते हो कि तुमने बीज बोया, पौधा उगा, पेड़ बना और क्रमशः उससे लकड़ी, पत्ते, फूल और फल मिले। ऑक्सीजन भी मिली इसका ध्यान ही नहीं है। यह सम्पूर्ण घटना का विश्लेषण है। किसी को यह ध्यान नहीं है कि निर्जीव बीज में से अंकुरण के रूप में जीवन कहाँ से और कब आ गया। बीज धरती को सौंप कर तुम घर आ गये उसे किसने उगाया। तुम उसे बढ़ता हुआ देखते रहे लेकिन उसके विकास में दिन-रात कौन लगा रहा? पानी तुम्हारा नहीं है, प्रकाश तुम्हारा नहीं है, हवा तुम्हारी नहीं है यह सब उस परमात्मा के बनाये संसाधन है और तुमने उसकी प्रकृति से ही जुगाड़े हैं। तुमने व्यवस्थापन किया इतने तक विश्लेषण है पर बीज से वृक्ष और वृक्ष को उसकी सम्पूर्णता तक पहुंचाने की प्रक्रिया संश्लेषण है। बीज की बीज से वृक्ष हो जाने तक की यात्रा रूपान्तरण है। सम्पूर्ण प्रकृति और जीव जन्तु प्रतिपल एक अदृश्य शक्ति के द्वारा रूपान्तरण से गुजर रही है। मैं भी, तुम भी, सभी। कुछ होता हुआ दिखाई दे रहा है शेष कुछ हो तो रहा है पर कारक दिखाई नही दे रहा है, वह परमात्मा का प्रताप है, हम महसूस करें।

रामनारायण सोनी
१५.०२.२१


Thursday, 11 February 2021

मन की सुखानुभूति

आत्मदीप 

लघु काल-चिन्तन ९५

"मन की सुखानुभूति"

दाख छुहारा छांडि अमृत फल विषकीरा विष खात॥
... सूरदास जाकौ मन जासौं सोई ताहि सुहात॥
ऊधौ मन माने की बात।
जिसे जो भा जाए उसे उसमें सुख लगने लगता है। किसी को किसी बात में सुख लगता है तो किसी और को कुछ अन्य में। अब सर्प को ही लो, उसे दाख-छुआरा व अमृत फल अच्छे नहीं लगते उसे विषैले जीव जन्तु ही खाने में सुख लगता है। सब कुछ जानते हुए भी प्राणपण से चाहने के कारण ही पतंगा दीपक पर अपने प्राणों को न्योछावर कर देता है, उसे इसमें ही बहुत सुख लगता है। 
सुख के दो स्तर है एक शारीरिक स्तर दूसरा मानसिक स्तर। शारीरिक स्तर का सुख भौतिक सुख है जिसे पाने के लिये विज्ञान ने भरपूर साधन दिये हैं। लेकिन ध्यान रहे, ये सुख भी मन तक जाते हैं। गर्मी में अगर पंखे से मन नहीं भरा तो आपको ए.सी. चहिये। विपरीत स्थितियों के बावजूद मन मान गया तो सुख अनुभूत हो सकता है। कविकुल के सूर्य सूरदास जी ने इसलिये कहा कि "मन मानै की बात"।
थोड़ा सा टिकाऊ सुख चाहिये तो हमें यह संस्कृत का सुभाषित मदद करेगा।
विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं तत्सुखं।।
यहाँ विद्या से तात्पर्य वह विद्या है जो मुक्तिबोध के साथ भोग का भाव दे दे। "सा विद्या या विमुक्तये"। ऐसी उस विद्या से विनय प्राप्त करें, विनय से ही शुभ-शुभ ग्रहण करने की पात्रता आती है। इस पात्रता से उपार्जित धन से ही धर्म आता है। यह धर्म मजहब के अर्थ में नहीं अपितु वह धृति अर्थात धारण करने की क्षमता से है। सत्पात्र हो तो शुभ धारण होगा फिर इस संपूर्ण प्रक्रिया से गुजरने पर जो सुख मिला वही सच्चा सुख होगा। सुख एक अनुभूति है पर इसे कैसे प्राप्त करें यह हमारी चॉइस है।

रामनारायण सोनी
१२.०२.२१


Wednesday, 10 February 2021

चेतना, ऊर्जा और परमात्मा

आत्मदीप

लघु काल-चिन्तन ९३

चेतना, ऊर्जा और परमात्मा

हमारे जन्म-मृत्यु को संसार जीवन की प्रथम और अन्तिम घटना समझता है लेकिन इसका आध्यात्मिक अर्थ जड़ तत्वों में चेतना का संयोजन-वियोजन ही है। इसी चेतना से जड़ तत्वों का क्रमिक विकास भी होता है और विनाश भी।
सृजन भी जड़ तत्वों का संयोजन ही है पर इसके मूल मैं चेतना ही होती है। सड़क, मकान, बगीचे आदि आदमी ही बनाता है। नव निर्माण के लिये कुछ तोड़ता है, खोदता है, कुछ को इधर उधर करता है यह चाहे डिस्ट्रक्शन हो पर इसके मूल में कोई चेतन ही तो है। वस्तुतः सृजन नवीन तत्व नहीं बना सकता पर नवीन संरचना का निर्माण कर सकता है। आदमी मिट्टी से ईंट, ईंट से मकान तो बना सकता है पर मिट्टी जो तत्व है न, उसे नहीं बना सकता। आदमी रोबोट तो बना सकता है पर वह उसमें जीवन का संचार नहीं कर सकता। चेतना से ही जीवन की अभिव्यक्ति है। हमारे शरीर के तेईस अचेतन तत्वों को एक मात्र चेतना जीवन का संचार करती है। चेतना है तो विचलन है, विकास है, ध्वंस है। चेतना का शरीर छोड़ का विलग हो जाना भी स्वयं एक क्रिया है। दूसरे शब्दों में चेतना ही ध्वंस भी करती है। चेतना परमात्मा की सत्ता का ही आभास है। जब चेतना का आभास हो जावेगा तो हृदय में बैठे उस परमात्मा का आभास भी हो जावेगा, इस जगत के कण कण में व्याप्त चेतन का आभास होते ही उस परम सत्ता का बोध हो जावेगा।
जैसे नदी का स्रोत से उद्गम होना जन्म है, बहना जीवन है और विसर्जन है उसकी मृत्यु। नदी का ऊर्जामय प्रवाह है चेतना की अभिव्यक्ति। और चेतना परमात्मा की परा शक्ति का गुण है।
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान्।। गीता 13/20।।
"जड़ चेतन जग जीव जत, सकल राम मय जान।" अपना आत्मदीप जलाए रखो। बस जो सदा से है ही उसका आभास करो, मौज में रहो।

रामनारायण सोनी
१०.०२.२१

जर्रे जर्रे में तू ही तू

आत्मदीप

लघु काल-चिन्तन ९२

"जर्रे जर्रे में तू ही तू"

मैंने पद्मनाभ को तो नहीं देखा पर धरती की गोद में लेटे उस तालाब में खिले पद्म को जरूर देखा है। जलते तपते सूरज को अपनी नग्न आँखों से नहीं पर उसकी किरणों को जीवन की बरसात करते देखा है। उस चाँद को आकाश में टँका जरूर देखा है जो चाँदनी का सौंदर्य धरती को ओढ़ाता है। इस धरती को मिट्टी सा तो देखा कई बार देखा पर उसमें उस माँ को कभी नहीं देखा जो अपनी कोख में जीवन का सृजन करती है। देखा तो मैनें उस विशाल सागर को भी नहीं पर उसके भेजे उन बादलों को जरूर देखा है। इस पवन को भूलूँ कैसे जो न होती तो मलय की खुशबू वहीं मर जाती। ये जो अगन मेरे पेट में लगी है, अगर वह नहीं होती तो खाया पिया पचाता कौन? प्राण को देख सका कौन पर हाड़ माँस के इस पिंजर को चलते फिरते जरूर देखा है। धरती पर बहती नदियों को भी देखा है पर नही जानता था कि वे निर्जन पहाड़ों से जीवन लेकर मैदानों में उतरती है।
तू वैसे तो मुझे कभी न दिखा पर ऐसे तो पल पल दिखता है। पहले मैं चूक गया था कि मैं बच्चों के रुदन में, किलकारियों में, मासूमियत में तुझे देख नही पाया। अरे वहाँ भी तू है और यहाँ तो तू है ही। तू मुझ से कितना प्रेम करता है। महसूस करना चाहिये हमेशा। जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है।

रामनारायण सोनी
८.२.२१

Tuesday, 9 February 2021

अपनी दुनिया सजाएँ

आत्मदीप

लघु काल-चिन्तन ९४

"अपनी दुनिया सजाएँ"

हर आदमी में एक शिल्पी मौजूद है। जैसे मूर्तिकार के पास केवल छैनी-हथौड़ा होता है अौर सामने पडा होता है एक बेडौल सा पत्थर। हथौड़ा चलाने के पहले ही वह अपने मन में सब कुछ गढ़ लेता है। उसका मन त्रिकाल दर्शी है। कैसे उस पत्थर में छुपी भविष्य की मूर्ति देख लेता है। जाहिर है कि भीतर का प्रतिबिम्ब ही बाहर आता है। सृजन तो उसके भीतर भरे कल्पनालोक का ही उत्सर्जन है। उत्सर्जन वास्तव में तो ऊर्जा का विसर्जन है और ऊर्जा चेतना का प्रसाद है, चेतना परमात्मा की कृपा ही है। शायद वह यह जानता नहीं पर ऐसा है ही।
यह शिल्प कभी काव्य है, कभी चित्र है, कभी बिम्ब है, स्वयं का व्यक्तित्व है, कभी भौतिक-अभौतिक निर्माण है। एक बारगी सम्पूर्ण प्रक्रिया को नए सिरे से देखें तो यह मन के संकल्पों और निकल्पों से छन कर आई कृतियाँ है। मन की इस अपरिमित शक्ति का जिन्हें अहसास नहीं वे उस बड़े से ताले के समान हैं जो कुबेर के कोष में उसके दरवाजे पर टँगा रहता है।
हर शिल्प में, हर सृजन में, हर बिम्ब में आपके मन का ही प्रतिबिम्ब है इसलिये तब नहीं तो अब शुभ संकल्प वाला बनाएँ। मौलिक सृजन हमारी सब की अपनी-अपनी पूँजी है। कुछ अच्छा सा बनाएँ। अपनी दुनिया अपनी तरह से सजाएँ। 

येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत्परिगृहीतममृतेन सर्वम्। येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥ऋग्वेद/२३/४॥
अर्थ जिस शाश्वत मन के द्वारा भूतकाल, वर्तमान काल और भविष्यकाल की सारी वस्तुएँ सब ओर से ज्ञात होती हैं और जिस मन के द्वारा सात होतावाला यज्ञ विस्तारित किया जाता है, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्प वाला हो।


रामनारायण सोनी

Sunday, 7 February 2021

शाम के बाद दिन?/

वक्त तो वक्त
नज़र भी 
कहीं और ही व्यस्त है।
जानते नहीं?
कि वे फूल 
खिलते है रोज
कि कहीं दृष्टि पड़ जाए 
उन पर भी, पर
शायद पता नहीं इन्सान को
मुरझाई कलियाँ, 
कभी कहाँ खिलती है
आज की नदी आज बही,
कल वही कहाँ मिलती
वक्त है कि मिलता नहीं है
पर वक्त रुकता ही कब है?
*चुक जाऊँ वक्त के साथ*
तो वक्त क्या करे
*शाम के बाद दिन*
*होता ही कब है?*

रामनारायण सोनी

Thursday, 4 February 2021

सब से बड़ा आश्चर्य

आत्मदीप

लघु काल-चिन्तन ९१

"सब से बड़ा आश्चर्य"

निबन्ध प्रतियोगिता चल रही थी। भाग लेने वालों में सात से ले कर सत्तर बरस के बच्चे, स्त्री, पुरुष शामिल थे। विषय था "दुनिया के महान आश्चर्य क्या हैं?" समय था तीस मिनिट। सबने लिखा और समय पूरा होने पर प्रेक्षक को दे दिया। एक

बालिका ने अपना पर्चा नहीं दिया वह अभी भी खिड़की से बाहर आसमान की तरफ एक टक देख रही थी। प्रेक्षक ने कहा तुम्हारा लिखने का समय पूरा हो गया अब अपना पर्चा जमा कर दो। बालिका की तन्द्रा टूटी और अचकचा कर अपना पर्चा प्रेक्षक को थमा दिया। सारे पर्चों की निर्णायकों ने जाँच की। अधिकतर लोगों ने स्कूल में पढ़े-पढ़ाये, सुने-सुनाए आश्चर्यों का जिक्र किया था।
परिणाम सुनाने के बजाय निर्णायक ने उस बालिका का पर्चा लोगों को सुनाया और कहा कि अन्तिम निर्णय आप लोग ही करें।
बालिका के पर्चे में लिखा था - मैं दुनिया के आश्चर्यों को नहीं जानती। मेरे घर के ड्राइंगरूम में एक पेंटिग लगी है जिसमे प्रकृति का सुन्दर चित्रण है। वह कुछ हजार रुपयों की है। मुझे आश्चर्य है कि खिड़की से झाँकते ये पेड़ पौधे, बाग बगीचे कितने मूल्यवान होंगे। मैं हाड़ माँस की बनी हूँ पर फिर भी सुन सकती हूँ, बोल सकती हूँ, चल फिर सकती हूँ और मन चाहा कुछ भी कर सकती हूँ। मेरी छोटी सी आँख की पुतलियों में कितना बड़ा आकाश समा जाता है। मैं बस महसूस कर रही हूँ। मैं क्या क्या गिनाऊँ..? रुआँसे परीक्षक ने कहा कि मैं पूरा पढ़ने के बजाय आखिरी लाइन पढ़ता हूँ.."इन आश्चर्यों को मैं जीवन भर लिखती रहूँ तो भी कभी पूरा लिख नहीं पाऊँगी।"

"आओ चलो! ऐसा बचपना ला कर देखें।"

रामनारायण सोनी
०५.०२.२१

परमात्मा कितना दयालु है

लघु काल-चिन्तन ९०

"परमात्मा कितना दयालु है"

तुम समुन्दर देखने गये और किनारों पर फैली रेत वहाँ इकट्ठी हुई कुछ फैन, उठती गिरती लहरें देख कर लौट आये तो तुम्हारा देखना अधूरा है। समुन्दर में एक पूरा का पूरा संसार है। वहाँ जलीय वनस्पतियाँ, रंगबिरंगी मछलियाँ, खूबसूरत प्रवाल, मोतियों भरी सीपें भी मौजूद है। ऊपर से कोलाहल भरे तल के नीचे नीरवता, चिर प्रशान्ति और गहनता विद्यमान है। वहाँ भी जीवन दौड़ता, खेलता कूदता है, मचलता है। उन जीवों का वहाँ भी एक जीता जागता संसार है। यह समुन्दर आत्मसंयमी है, अपने निर्बन्ध किनारों को हदें मान कर उसमें संयत रहता है। खुद तपता है और अपने खारे जल से मीठा जल निकाल कर पूरी धरती को देता है। अपनी छाती पर तुम्हारे माल असबाब देश-देशान्तर में ढोता है। वैसे ही वनों को भी बियाबान समझ कर ही देखा है, उन्हें बस बीहड़ समझा है। वे पूरे जगत को खनिज, ओषधियाँ, नदियाँ, ईंधन और भी अनगिनत चीजें देता है। सूरज ऊर्जा के भण्डार लिये सतत खड़ा है। चाँद भी आता है अपनी शीतल चाँदनी ले कर। तुमने इन्हें भी इस तरह नहीं देखा होगा। और जिस धरती पर तुम खड़े हो उसे माँ की तरह हमने शायद कभी देखा ही नहीं। हमने अपने ऐशो-आराम के लिये इन सब में जगह जगह विकृतियाँ पैदा करने में कसर नहीं छोड़ी है।
प्रकृति का कण-कण पूरी मानवता और जीवजगत के पोषण में रात-दिन, क्षण-क्षण लगा हुआ है। प्रकृति के ये उपकार हम पर ऋण हैं। पे बेक का भी सोचें। वह परमात्मा कितना दयालु है।
हमने शायद सिक्के का उसके नगदी वाला पहलू देखा और उसके बदले में जीवन के उपयोगी सामान खरीदे हैं। इसके दूसरे पहलू में राष्ट्र की अस्मिता, जीवन मूल्यों का अहसास और उस के पुंसत्व की संप्रभुता दिखाई नहीं देती। हम प्रकृति के कल्याण कारी तत्वों का अहसास करें और उस सृष्टिकर्ता के प्रति कृतज्ञता का भाव रखें।

रामनारायण सोनी
०४.०२.२१

विश्लेषण और संश्लेषण

आत्मदीप

लघु काल-चिन्तन ८९

"विश्लेषण और संश्लेषण"

मैने एक सरोवर देखा, विपुल जलराशि देखी, सरोवर के जल में तैरती बतखें देखी, जल की सतह पर खिले हुए कमल देखे, किनारे पर खड़े अमलतास के पेड़ से झरते फूलों से जल पर बनी रंगोली देखी और उनकी गिनती करने में लग गया। उनकी जातियाँ, प्रजातियाँ, प्रकारान्तर, और गहन अध्ययन में लग गया। जो भी मुझे उपलब्ध हुआ वह कम नहीं था। वह मेरी पुरानी जानकारी में अभिवृद्धि थी और कुछ नया-नया भी जुड़ गया था लेकिन दर्शन की भाषा में यह एक विश्लेषण था, एनालिसिस था। व्यर्थ नहीं था एक विश्लेषक की दृष्टि में पर्याप्त था। अभी इसका सिन्थेसिस होना शेष है। जब इसका सिन्थेसिस होगा तो सरोवर, उसका जल एक रंगमंच हो जावेगा, कमल में सुगन्ध आने लगेगी, बतखें केलि करती दिखाई देगी उसके तैरने से जल पर उठी लहरें डैनों की तरह फैल जाएँगी, प्रकृति अपने हाथों जलरंगोलियाँ बनाती नजर आवेंगी। यह उपादान प्रकृति और परमात्मा की अनुपम कृति का संस्लेषण है सिन्थेसिस है। महसूस करें हम।

रामनारायण सोनी
०४.०२.२१

Tuesday, 2 February 2021

यह पल ही मेरा है

आत्मदीप

लघु काल-चिन्तन ८८

"यह पल ही मेरा है"

एक आदमी आइने के सामने खड़ा हुआ अपने आप को निहार रहा था। देखते देखते उसके चेहरे की हवाइयाँ उड़ने लगी। उसे अपनी शक्ल में भविष्य की झुर्रियाँ दिखाई देने लगी। जरावस्था दिखाई देने लगी। हाथ पैरों में अकड़न होने लगी। एक अनपेक्षित हताशा मन में उठने लगी। बहुत घबड़ाया और आइने के सामने से हट गया। अपने हाथों से खुद को टटोला चेहरे पर हाथ घुमाया उसे आनन्द हुआ सब ठीक तो है मैं यूँ ही परेशान हुआ भविष्य की परिकल्पना में। वह लौट कर कुर्सी पर बैठ गया। अचानक उसका ध्यान सामने पड़े फोटो एल्बम पर गया। उसने खोल कर देखा। उस एल्बम में उसके बचपन के चित्र लगे थे। एक प्यारा सा बचपन। वह उन छायाओं के संग-संग फिर अतीत में डूब गया। उसे लगा कितना सुहाना बचपन था, सब कुछ खो गया। आदमी फिर मायूस हुआ। एक से निकल कर फिर एक और हताशा में पड़ गया। घबड़ा कर उसने अल्बम कबड़ में रख दिया। वह इस सफोकेशन से बाहर निकलने के लिये खिड़की के पास चला गया। बाहर झाँक कर देखा- पंछी गा रहे थे, शीतल मन्द सुगन्धित हवा बह रही थी, पेड़ की नर्म टहनियों पर नव कोंपलें सज रही थी। दूर कहीं कोई पछिपि बाँसुरी पर राग यमन बजा रहा था। यह सब देख देख आनन्दित होता रहा।
यह आदमी कोई और नहीं मैं ही था। मैं वर्तमान को छोड़ का भविष्य और भूतकाल में उलझा हुआ था, वर्तमान में थी ही नहीं। जैसे ही वर्तमान में लौटा सारे अवसाद चले गये। अतीत वह है जिसे कोई लौटा नहीं सकता, भविष्य वह है जिस पल की किसी को खबर नहीं है। लेकिन यह गारन्टी है कि वर्तमान मेरा है मैं चाहूँ तो इसे जियूँ। अगर इसे जिया नहीं तो अगले पल यह अतीत हो जाएगा। दीवार पर टँगी घड़ी में सेकण्ड का वह काँटा कुछ कह रहा है। उसने दूसरे दो काँटों को इतिहास दर्ज करने के लिये छोड़ दिया है। स्वयं बस वर्तमान लिये चल रहा है। वह वर्तमान जो अतीत का बीज और भविष्य का निर्माता है। केवल आज ही नही, यह 'अभी' मेरा है। अभी नहीं तो कभी नहीं। यह देखिये मैं आपसे संवाद कर के कितना खुश हूँ। आप भी हैं ना?

रामनारायण सोनी
  ०३.०२.२१

Monday, 1 February 2021

पमात्मा और प्रकृति

आत्मदीप

लघु काल-काल चिन्तन ८७

"पमात्मा और प्रकृति"

वृक्ष का जीवन जड़ों से है जो दिखाई नहीं देती जबकि वृक्ष स्वयं ही जीवित दिखाई पड़ता है। वृक्ष को कहीं से भी काट दें तो जड़ों से जीवन फिर लौट आवेगा जबकि पूरा जमीन का पूरा ऊपरी भाग साबुत रहे लेकिन जड़ें काट दी जाएँ तो वृक्ष मर जावेगा। सागर को देखें तो लहरें और पानी की सतह दिखाई देती है सागर नही। हमें जीवन दिखाई देते हैं जीवन के ने मूल स्रोत और जीवन को धारण करने वाली शक्ति नहीं दिखाई पड़ती। जो दृश्यमान है वह किसी अदृश्य शक्ति की बदौलत चल रहा है। रथ के घोड़े चलते हुए दिखाई देते हैं घोड़ों में विद्यमान प्राणशक्ति दिखलाई नहीं पड़ती। नदी सूखी पड़ी हो और अचानक बाढ़ आ जाए तो समझो कि उसकी अपस्ट्रीम में कहीं बारिश हुई है अथवा किसी जलस्रोत से पानी छोड़ा गया है। हमारे जीवन की जड़ें भी प्राण से सिंचित हैं जो हमें दिखाई नहीं देते फिर ये प्राण भी उस अदृश्य शक्ति से अनुप्राणित है उसको देख पाना असंभव है। इसे पतंजलि ने अनुमान प्रमाण कहा है। यह गणित का प्रमेय अर्थात् थ्योरम भी नहीं है जो किसी भौतिक अभौतिक साधन से सिद्ध की जा सकती है। इस सम्पूर्ण जगत में जो कुछ दृश्यमान है वह उस अदृश्य की अदृश्य शक्ति से अनुशासित है। 
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।७/४ श्रीमद्भगवद्गीता।।
 पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश -- ये पञ्चमहाभूत और मन, बुद्धि तथा अहंकार, यह आठ प्रकार के भेदों वाली मेरी 'अपरा' प्रकृति है। हे अर्जुन ! इस अपरा प्रकृति से भिन्न जीवरूप बनी हुई मेरी 'परा' प्रकृति को जान, जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है।
"महसूस करो ईश्वर की उस शक्ति को और स्वयं उस परम को।"

रामनारायण सोनी
०२.०२.२१
 

जो चाहेसि उजियार

आत्मदीप

लघु काल-चिन्तन ८६

जो चाहेसि उजियार

मेरे भीतर आप और आपके भीतर मैं नहीं देख पाऊँगा लेकिन कोशिश करने पर अपने अपने भीतर हम जरूर देख सकते हैं। आपके भीतर का अनुभव आपके पास है और मेरा मेरे पास। मैने गुड़ खाया तो आपका मुँह मीठा नहीं हो सकेगा। आपका जाना हुआ भी आपका है। आपकी प्यास आपके पानी पीने से ही बुझेगी दूसरे शब्दों में कहें तो आप आर प्यासे हैं तो पानी की तलाश आपको करनी होगी। मैं पानी की उपलब्धता की सूचना भर दे सकता हूँ। पानी के बारे में मै या कोई और आपको बताएगा वह सूचना भर है। आपका अनुभव ही आपका वास्तविक ज्ञान है उसके विषय बाकी में जानकारियाँ  ज्ञान नहीं सूचनाएँ है। प्रेम की जानकारी प्रेम नहीं है, प्रेम भरी चेष्टाएँ भी प्रेम नहीं है वह प्रदर्शन तो हो सकता है प्रेम नहीं। आपका अन्तर का कण कण प्रेम में डूब जाएगा प्रेम तभी हो सकेगा। उपासना, प्रार्थना, आराधना, भजन आदि जो भी आप करना चाहें आपको स्वयं करनी होगी। यह समझ लेना जरूरी है कि मेरी चेतना का जागरण आपको नहीं मुझे ही करना होगी केवल चेतना के बारे में काम नहीं चलेगा। कोई आपका दिया सुलगा सकता है पर आपके अन्तर के प्रकाश के लिये दिया आपका अपना दिया ही काम आवेगा। इसलिये स्वयंप्रकाश चाहिये तो आत्मदीप जलाइये। मीरा ने प्रेम किया वह मीरा का था। आपको अपना अपने स्वये द्वारा ही करना पड़ेगा। आपका अनुभव ही आपका ज्ञान है। भोजन की सूचनाओं से पेट भरने वाला नहीं भूखे हो तो भोजन करना पड़ेगा। ईश्वर की अनुभूति चाहिये तो भक्ति, उपासना, प्रार्थना जो भी करना हो स्वयं को करना है।
"आत्मदीप आपका प्रकाश स्तम्भ है।"  
राम नाम मनि दीप धरु जीह देहरी द्वार।
तुलसी भीतर बाहिरेउ जो चाहेसि उजियार।।

रामनारायण सोनी
 ०२.०२.२१

सब चल रहे हैं

आत्मदीप

लघु काल-चिन्तन २७

सब चल रहे हैं

हम सब चल रहे हैं। कहाँ से आ रहे हैं? कहाँ जा रहे हैं? आखरी छोरों पता नहीं पर बीच में तो हम चल ही रहे हैं नदी की तरह, हवा की तरह, सूरज-चाँद की तरह, दिन रात की तरह। कभी वाहन में बैठ कर कभी कुर्सी में बैठ कर। आश्चर्य तो यह है कि हम बैठे-बैठे या खड़े रह कर भी चल रहे हैं। ब्रह्माण्ड का कण-कण चल रहा है। लेकिन जो खड़े-खड़े या पड़े-पड़े चल रहा है वह हम जान नहीं पा रहे हैं। 
सूर्य खुद में चल रहा है, ग्रह-उपग्रह उसके इर्द-गिर्द चल रहे हैं। ऐसे में हम धरती पर चाहे सो रहे हैं तो भी हम सूर्य के आस पास एक कक्षा में चल रहे हैं। आपको जान कर अचरज होगा कि जड़ अणु-परमाणु में भी इलेक्ट्रॉन नान स्टॉप चल रहा है। 
इन सब का यह चलना तो पता चल गया पर चलाने वाला कहीं दिख नहीं रहा है। यह भी पता नहीं कि सब के सब नियमबद्ध चल रहे हैं पर ये नियम किसने बनाए हैं? वे सब के सब वैसे ही चल रहे हैं जैसे उनके लिए नियम बनाए गए हैं।
बाल्यावस्थामें जो शरीर था, वह बदल गया। साथी, सामग्री, भाव, उद्देश्य, इन्द्रियाँ सब बदल गयीं फिर भी मुझ में मौजूद यह "मैं" तो वही हूँ, यह नहीं बदला, मेरी अस्मिता वही की वही है। मैं वही हूँ, यह सत्य है। ॐ तत्सत्। सत्-तत्त्व ज्यों-का-त्यों है। मैं वही अमर आत्मा हूँ।

रामनारायण सोनी

श्री

अनुक्रम    1 अयं आत्मा ब्रह्म  2 विक्षिप्त अथवा मुक्त  3 अद्वैताभास 4 शब्द ब्रह्म 5 जड़ में चेतन और चेतना का दर्शन 6 "समस्त ...