आत्मदीप
लघु काल-चिन्तन १००
"जीवन में विकास के ढाँचे"
हमारे बचपन में हम कोरे कागज़ की तरह थे। हर दिन इच्छाएँ, भावनाएँ, आशाएँ और संकल्पनाएँ जुड़ती चली गई।
इच्छाएँ एकदम नेचुरल हैं उन्हें कोई रोक नहीं सकता इच्छाएँ कुछ पूरी हुई होती हैं और कुछ अधूरी ही रह जाती हैं।
भावनाएँ कहीं जीवन को रसात्मकता में डुबो गई तो कहीं रिश्तों को जोड़ तोड़ गई परन्तु ये न होती तो आदमी पशु के समान होता, वह पशु जो अपने समूह में से किसी के मर जाने पर भी चरता फिरता है। भावनाएँ अन्तःकरण का जुड़ाव है। कभी यह आकर्षण है तो कभी विकर्षण परन्तु ये भावनाएँ ही जीव जगत में मनुष्य को श्रेष्ठतम बनाती हैं। भावना का सबसे बड़ा प्रॉडक्ट है सम्वेदना, फीलिंग। तुम्हारा दुःख जब मेरा अपना लगे तब मैं समझूँगा कि मेरा तुम्हारा अन्त:करण स्ट्रॉन्ग बॉण्डेज में है। यदि मुझे खुशी मिली है और मैं तुम्हे उसमें शामिल करना चाहूँ तो भी ऐसा ही है। मेरी भावनाएँ परिशुद्ध हैं तो ही मैं तुम से प्रेम कर पाऊँगा। अन्यथा नकली चढ़ाया मुलम्मा जिन्दगी भर नहीं चलता है।
आशाएँ अमर धन हैं। आशाएँ जीवन की रेल की पटरियाँ हैं जिन पर जीवन दौड़ता है। मरी आशाएँ लेकर कंकाल को ढोना निरर्थक है। पर आशाएँ अतृप्त अपेक्षाएँ न बने उसमें पुरुषार्थ के संवाहक लगे रहें।
संकल्पनाएँ दो महान प्रक़म से जुड़ी हैं एक संभावना और दूसरे स्वप्न। सम्पूर्ण मानवता का विकास इन्ही काँधों पर चलता है। आदमी पहले संभावना टटोलता है फिर उन पर आधारित देखे गए स्वप्नों को साकार करने में लग जाता है। ये दोनों जरूरी है अन्यथा उस एक चप्पू वाली नाव की कल्पना कर लो जो सतत चलने पर भी किनारा नहीं छोड़ पाती है।
इच्छाएँ, भावनाएँ, आशाएँ और संकल्पनाएँ जीवन के आवश्यक और अनअवाइडेबल परिस्थितियों का निर्माण करती हैं पर इन घटकों से ही जीवन की पूर्णता है। इन्हें सन्मार्ग की ओर मोड़ दें। विवेक का आत्मदीप जलाए रखें।
रामनारायण सोनी
१९.०२.२१
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