Friday, 19 February 2021

अमर आत्मा सच्चिदानन्द मैं हूँ

आत्मदीप

लघु काल-चिन्तन १०१

"अमर आत्मा सच्चिदानन्द मैं हूँ"

सागर की उठती गिरती लहरें कह रही है कि समुद्र में लहरों की यात्रा अब भी अनवरत चल रही है। लहरें बीच सागर में जन्मती है, दूसरी लहरों के संग संग दौड़ती हैं, उछलती कूदती हैं, अठखेलियाँ करती हैं। सारी लहरें किनारे की और दौड़ती हैं और इनकी ये दौड़ें किनारे पर आ कर समाप्त हो जाती हैं। दौड़ती लहरें ही अलग अलग दौड़ते जीवन हैं। लहरें पानी पर चुपचाप खड़ी नहीं रह सकती हैं उसे दौड़ना ही पड़ेगा। रुकने का अर्थ है लहरों का बीच में ही मर जाना। हर लहर में पानी है वही सागर का पानी। गौर करें तो इस उठते गिरते पानी की वर्तमान पहचान, वर्तमान संज्ञा ही लहर है। इस उठते, गिरते, चलते पानी का नाम हमने दिया है 'लहर'। लहर जब अपनी यात्रा सम्पूर्ण कर के किनारे पर आ कर मर जाती है तो असल में वह फिर से अव्यक्त हो जाती है। उसका पानी समुद्र का ही पानी है। न वह पहले अलग था और न ही अब अलग हुआ है। इस लहर का नाम हम जो चाहे रख लें, जैसे 'सुनामी' आदि। अपनी पहचान भी शारीरिक संज्ञान से है वस्तुतः लहर के पानी की तरह पर हम सभी में वही एक अमर आत्मा मौजूद है अर्थात् हर एक के मूल में तात्विक रूप से 'मैं' ही अद्वैत विशुद्ध आत्मा हूँ, यहाँ भी, वहाँ भी, सब जगह मैं ही हूँ। 

रामनारायण सोनी
१९.०२.२१


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