Tuesday, 16 February 2021

मन से ही व्यक्तित्व बनेगा

आत्मदीप

लघु काल-चिन्तन ९९

"मन से ही व्यक्तित्व बनेगा"

पहले एक विज्ञापन प्रसिद्ध हुआ करता था- "उसकी साड़ी मेरी साड़ी से सफेद क्यों?" यह विज्ञापन जिसने भी बनाया उसका उद्देष्य अपने प्रॉडक्ट का व्यापार बढ़ाने के लिये था। जो भी हो उसने मानव के मस्तिष्क का और सोच का अध्ययन जरूर किया होगा। यह सोच दो कारणों से हो सकती है, एक प्रतिस्पर्धा और दूसरा ईर्ष्या। प्रतिस्पर्धा स्थस्थ मन की पहचान है और विकास का उत्तम मार्ग है लेकिन ईर्ष्या एक न एक दिन पतन पर जरूर ढकेल देगी। लेकिन श्रेष्ठतम मार्ग है मेरे अपने तरीके से प्राप्त की गई निरभिमानी स्वच्छ सफेदी। यह मार्ग सत्व गुणी है। प्रतिस्पर्धा रजोगुणी है और ईर्ष्या तमोगुणी है। सम्पूर्ण प्रकृति में देश काल की सीमाओं के परे प्रत्येक मानव में भी ये तीनों गुण हमेशा विद्यमान है और जिस समय जो डोमिनेटिंग होगा व्यवहार वैसा ही होगा। अधिक समय तक जो व्यवहार में रहेगा वह आचरण में आ जावेगा। आचरण जैसा जैसा होता जाएगा वैसी वैसी आदत बनती जाएगी। आदतें व्यक्तित्व का निर्माण करती है और ठीक वैसी ही हमारी पहचान बन जाती है।
अब समूची प्रक्रिया को शुरू से आखिर तक फिर से देखें तो स्पष्ट दिखाई देता है कि व्यक्तित्व का निर्माण सोच से होता है। मजे की बात यह है कि सोचना मन का धर्म है। मन जहाँ चाहे वहाँ ले जाता है। मन में आया कि लडडू खाना तो लड्डू के पास दौड़ाएगा, मूवी देखना है तो सिनेमा हाल तक दौड़ाएगा, भगवान के दर्शन करना है तो मन्दिर ले जाएगा और अधिक ध्यान से देखें तो हम वही सब करने में लगे हैं जो कि मन हम से करवा रहा है। इसलिये मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि - "मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो।" ऋग्वेद की ऋचा यही कहती है --
सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान् नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव। हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥६॥

अर्थ: जो मन मनुष्य को अपनी इच्छा के अनुसार उसी प्रकार घुमाता है, जैसे कोई अच्छा सारथि लगाम के सहारे वेगवान् घोड़ों को अपनी इच्छा के अनुसार नियंत्रित करता है; बाल्य, यौवन, वार्धक्य आदि से रहित तथा अति वेगवान् जो मन हृदय में स्थित है, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्प वाला हो।

रामनारायण सोनी
१७.०२.२१

No comments:

Post a Comment

श्री

अनुक्रम    1 अयं आत्मा ब्रह्म  2 विक्षिप्त अथवा मुक्त  3 अद्वैताभास 4 शब्द ब्रह्म 5 जड़ में चेतन और चेतना का दर्शन 6 "समस्त ...