Monday, 15 February 2021

कड़वे सवालों के मीठे जवाब

आत्मदीप

लघु काल-चिन्तन ९८

"कड़वे सवालों के मीठे जवाब"

मैं भी कभी कभी बड़ी अजीब हरकतें करता हूँ। मैं जवाबों में सवाल ढूँढता हूँ मुझे वहाँ जवाब मिलने लगते हैं। मैं खारे समुन्दर में मीठा पानी ढूँढता हूँ। क्या मिलेगा ठण्डा मीठा पानी? पर जवाब मुझे मिल जाता है, हाँ मीठे पानी के बादल का स्रोत यही है। मुझे ऊँचे पहाड़ों की गर्मी से तपी चट्टानों पर प्यास लगी। क्या यहाँ ठण्डा पानी मिलेगा? अचानक मुझे चट्टानों के बीच से झरझर करता शीतल पानी मिल जाता है। एक पौधे में मुझे काँटे ही काँटे दिखे, मैं फूल ढूँढ़ने लगा। मुझे गुलाब मिला। उस तालाब की तलहटी में बस कीचड़ ही कीचड़ था। क्या यहाँ कुछ अच्छा मिलेगा? वहाँ खूबसूरत हरियाए पत्तों की गोद में खिला कमल मिला, उस पर मंडलाते भँवरों का संगीत मिला, खुशबू मिली सौन्दर्य मिला। रेगिस्तान की दिन भर तपी धरती पर उतरती शाम में सुकून ढूँढा तो सुनहरे टीले की हथेली पर सूरज एक गेंद की तरह सजा बैठा था, केक्टस के सुर्ख फूल मुस्कुरा रहे थे।
उसकी हर अटपटी बात में मैंने कई अटपटे सवाल ढूँढे पर उन सवालो के खुद ब खुद जवाब मिले। मैं हैरान था कि कितनी ऋणात्मकता में भी सकारात्मक जवाब भरे पड़े हैं। मैं छोटी छोटी परेशानियों से घबरा जाता हूँ पर शायद वहीं कहीं आसपास उनके सुन्दरतम हल मौजूद होंगे, मैंने ध्यान से देखा नहीं। "नहीं हुआ" यह मेरी समस्या नहीं है, समस्या यह है कि "मैने किया नहीं"। उसने खारा समुन्दर मीठे पानी की सप्लाइ के लिये बनाया है। मेरे सवाल गलत हो सकते हैं पर गौर से देखो! उसके जवाब बहुत सुन्दर हैं, सटीक हैं। शायद नाजुक गुलाब की सुरक्षा के लिये काँटे तैयार किये होंगे। मैं अन्धाकार से परिपूर्ण गर्भ में उल्टा लटका पड़ा था तब मेरा पोषण और संवर्धन उसी ने किया। परमात्मा बड़ा दयालु है।

रामनारायण सोनी
१५.०२.२१

No comments:

Post a Comment

श्री

अनुक्रम    1 अयं आत्मा ब्रह्म  2 विक्षिप्त अथवा मुक्त  3 अद्वैताभास 4 शब्द ब्रह्म 5 जड़ में चेतन और चेतना का दर्शन 6 "समस्त ...