Sunday, 14 February 2021

जीवन नदी है, बहती नदी

आत्मदीप

लघु काल-चिन्तन ९६

जीवन नदी है, बहती नदी

मै जीवन हूँ एक नदी की तरह। हाँ! बहती हुई नदी। कठोर चट्टानों की कोख से जन्मा हूँ। जन्म मेरा प्रारम्भ और मृत्यु है सागर में अपनी अस्मिता का विसर्जन। जन्म होते ही चल पड़ा हूँ, चलना है काम मेरा। मेरी यात्रा तटों की सीमाओं से आबद्ध है। कई सहायक जल स्रोत आ आ कर मेरे आकार और सामर्थ्य को बढ़ाते हैं। मेरा स्वभाव सपाट बहना है लेकिन अवरोध आने पर मैं अपना मार्ग बदल लेता हूँ फिर भी मार्ग में चट्टान सी आई बाधा को तोड़ता हुआ आगे बढ़ता जाता हूँ। मैं नदी हूँ, रुक नहीं सकता। मेरा नैसर्गिक गुण है अपने पानी से प्यास बुझाना, प्यासे जीव-जन्तुओं की, प्यासी धरती की, प्यासे वनस्पति पेड़ पौधों की। लोगों! आओ!! मेरे सुहाने तट और इस पर बने घाट तुम्हें शीतलता प्रदान करेंगे। अपनी प्यास मुझे दे दो, बदले में मुझसे शीतलता ले जाओ। तुम्हारी प्यास मैं सागर को सौंप दूँगा वह अपने बादल भेज कर तुम्हारी प्यास फिर बुझाएगा। तुम प्यास लिये पैदा हुए हो और मैं तृप्ति। मैं नदी हूँ, बहती नदी।
तुम्हें सागर से मिलना है तो आओ! हम संग चलते हैं। मेरा पानी यदि किसी ने मैला न किया तो वह पारदर्शी ही रहेगा। आओ! मुझमें डुबकी लगाओ और तरोताजा हो जाओ पर अगर तुम तैरना नहीं जानते हो तो अपनी नाव ले आओ। संग चलो मैं तुम्हें अपने सुहाने घाट, तट, तट के तमाल, रसाल, शीशम, आम, जामुन के वृक्ष दिखाता हूँ। मैं नदी हूँ, बहती नदी।
तुम्हें यहाँ लोग मेरे सीने और बाजुओं से रेत मिट्टी खोदते हुए दिख जावें तो क्षोभ में मत पड़ना क्योंकि यह प्रक्रिया युग-युगान्तर से चल रही है। मैं नदी हूँ, बहती नदी।
मैं रुक गया तो बीच में ही मृत्यु है, बँध गया तो नई ताकत हूँ, चल पड़ा तो फिर नदी हूँ। छोटे मुझमें आ कर मिलते हैं मैं फिर छोटा बन कर अपने विशाल सागर में समा जाता हूँ। मेरा पानी फिर बादलों की पीठ पर चढ़ेगा, फिर लौटूँगा नदी बन कर। फिर वही नदी, बहती नदी।
जीवन चलने का नाम है। वेद कहता है "चरैवेति। चरैवेति।।"

रामनारायण सोनी
१३.०२.२१

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