Sunday, 14 February 2021

रूपान्तरण बीज का

आत्मदीप

लघु काल-चिन्तन ९७

"रूपान्तरण बीज का"

हर लकडी में आग है, हर फ्ते में नमी है, हर फल में ऊर्जा का भंडार है। लकड़ी में आग आई कहाँ से। तात्विक रूप से लकड़ी में कार्बन है। यह कार्बन पेड़-पौधों द्वारा जमीन के भीतर से खींचा हुआ नहीं है बल्कि हवा में से आयातित है। इस प्रक्रिया में शामिल है प्रकाश संश्लेषण। प्रकाश कुछ करता नही है बस उसकी मौजूदगी में पेड़-पौधों की पत्तियाँ हवा में से कार्बन तोड़ कर अपने पास रख लेता है और बाकी सब हवा को वापस लोटा देता है। तुम मोटे तौर से सिर्फ इतना ही जानते हो कि तुमने बीज बोया, पौधा उगा, पेड़ बना और क्रमशः उससे लकड़ी, पत्ते, फूल और फल मिले। ऑक्सीजन भी मिली इसका ध्यान ही नहीं है। यह सम्पूर्ण घटना का विश्लेषण है। किसी को यह ध्यान नहीं है कि निर्जीव बीज में से अंकुरण के रूप में जीवन कहाँ से और कब आ गया। बीज धरती को सौंप कर तुम घर आ गये उसे किसने उगाया। तुम उसे बढ़ता हुआ देखते रहे लेकिन उसके विकास में दिन-रात कौन लगा रहा? पानी तुम्हारा नहीं है, प्रकाश तुम्हारा नहीं है, हवा तुम्हारी नहीं है यह सब उस परमात्मा के बनाये संसाधन है और तुमने उसकी प्रकृति से ही जुगाड़े हैं। तुमने व्यवस्थापन किया इतने तक विश्लेषण है पर बीज से वृक्ष और वृक्ष को उसकी सम्पूर्णता तक पहुंचाने की प्रक्रिया संश्लेषण है। बीज की बीज से वृक्ष हो जाने तक की यात्रा रूपान्तरण है। सम्पूर्ण प्रकृति और जीव जन्तु प्रतिपल एक अदृश्य शक्ति के द्वारा रूपान्तरण से गुजर रही है। मैं भी, तुम भी, सभी। कुछ होता हुआ दिखाई दे रहा है शेष कुछ हो तो रहा है पर कारक दिखाई नही दे रहा है, वह परमात्मा का प्रताप है, हम महसूस करें।

रामनारायण सोनी
१५.०२.२१


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