आत्मदीप
लघु काल-चिन्तन ९५
"मन की सुखानुभूति"
दाख छुहारा छांडि अमृत फल विषकीरा विष खात॥
... सूरदास जाकौ मन जासौं सोई ताहि सुहात॥
ऊधौ मन माने की बात।
जिसे जो भा जाए उसे उसमें सुख लगने लगता है। किसी को किसी बात में सुख लगता है तो किसी और को कुछ अन्य में। अब सर्प को ही लो, उसे दाख-छुआरा व अमृत फल अच्छे नहीं लगते उसे विषैले जीव जन्तु ही खाने में सुख लगता है। सब कुछ जानते हुए भी प्राणपण से चाहने के कारण ही पतंगा दीपक पर अपने प्राणों को न्योछावर कर देता है, उसे इसमें ही बहुत सुख लगता है।
सुख के दो स्तर है एक शारीरिक स्तर दूसरा मानसिक स्तर। शारीरिक स्तर का सुख भौतिक सुख है जिसे पाने के लिये विज्ञान ने भरपूर साधन दिये हैं। लेकिन ध्यान रहे, ये सुख भी मन तक जाते हैं। गर्मी में अगर पंखे से मन नहीं भरा तो आपको ए.सी. चहिये। विपरीत स्थितियों के बावजूद मन मान गया तो सुख अनुभूत हो सकता है। कविकुल के सूर्य सूरदास जी ने इसलिये कहा कि "मन मानै की बात"।
थोड़ा सा टिकाऊ सुख चाहिये तो हमें यह संस्कृत का सुभाषित मदद करेगा।
विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं तत्सुखं।।
यहाँ विद्या से तात्पर्य वह विद्या है जो मुक्तिबोध के साथ भोग का भाव दे दे। "सा विद्या या विमुक्तये"। ऐसी उस विद्या से विनय प्राप्त करें, विनय से ही शुभ-शुभ ग्रहण करने की पात्रता आती है। इस पात्रता से उपार्जित धन से ही धर्म आता है। यह धर्म मजहब के अर्थ में नहीं अपितु वह धृति अर्थात धारण करने की क्षमता से है। सत्पात्र हो तो शुभ धारण होगा फिर इस संपूर्ण प्रक्रिया से गुजरने पर जो सुख मिला वही सच्चा सुख होगा। सुख एक अनुभूति है पर इसे कैसे प्राप्त करें यह हमारी चॉइस है।
रामनारायण सोनी
१२.०२.२१
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