Wednesday, 10 February 2021

चेतना, ऊर्जा और परमात्मा

आत्मदीप

लघु काल-चिन्तन ९३

चेतना, ऊर्जा और परमात्मा

हमारे जन्म-मृत्यु को संसार जीवन की प्रथम और अन्तिम घटना समझता है लेकिन इसका आध्यात्मिक अर्थ जड़ तत्वों में चेतना का संयोजन-वियोजन ही है। इसी चेतना से जड़ तत्वों का क्रमिक विकास भी होता है और विनाश भी।
सृजन भी जड़ तत्वों का संयोजन ही है पर इसके मूल मैं चेतना ही होती है। सड़क, मकान, बगीचे आदि आदमी ही बनाता है। नव निर्माण के लिये कुछ तोड़ता है, खोदता है, कुछ को इधर उधर करता है यह चाहे डिस्ट्रक्शन हो पर इसके मूल में कोई चेतन ही तो है। वस्तुतः सृजन नवीन तत्व नहीं बना सकता पर नवीन संरचना का निर्माण कर सकता है। आदमी मिट्टी से ईंट, ईंट से मकान तो बना सकता है पर मिट्टी जो तत्व है न, उसे नहीं बना सकता। आदमी रोबोट तो बना सकता है पर वह उसमें जीवन का संचार नहीं कर सकता। चेतना से ही जीवन की अभिव्यक्ति है। हमारे शरीर के तेईस अचेतन तत्वों को एक मात्र चेतना जीवन का संचार करती है। चेतना है तो विचलन है, विकास है, ध्वंस है। चेतना का शरीर छोड़ का विलग हो जाना भी स्वयं एक क्रिया है। दूसरे शब्दों में चेतना ही ध्वंस भी करती है। चेतना परमात्मा की सत्ता का ही आभास है। जब चेतना का आभास हो जावेगा तो हृदय में बैठे उस परमात्मा का आभास भी हो जावेगा, इस जगत के कण कण में व्याप्त चेतन का आभास होते ही उस परम सत्ता का बोध हो जावेगा।
जैसे नदी का स्रोत से उद्गम होना जन्म है, बहना जीवन है और विसर्जन है उसकी मृत्यु। नदी का ऊर्जामय प्रवाह है चेतना की अभिव्यक्ति। और चेतना परमात्मा की परा शक्ति का गुण है।
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान्।। गीता 13/20।।
"जड़ चेतन जग जीव जत, सकल राम मय जान।" अपना आत्मदीप जलाए रखो। बस जो सदा से है ही उसका आभास करो, मौज में रहो।

रामनारायण सोनी
१०.०२.२१

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श्री

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