आत्मदीप
लघु काल-चिन्तन ९२
"जर्रे जर्रे में तू ही तू"
मैंने पद्मनाभ को तो नहीं देखा पर धरती की गोद में लेटे उस तालाब में खिले पद्म को जरूर देखा है। जलते तपते सूरज को अपनी नग्न आँखों से नहीं पर उसकी किरणों को जीवन की बरसात करते देखा है। उस चाँद को आकाश में टँका जरूर देखा है जो चाँदनी का सौंदर्य धरती को ओढ़ाता है। इस धरती को मिट्टी सा तो देखा कई बार देखा पर उसमें उस माँ को कभी नहीं देखा जो अपनी कोख में जीवन का सृजन करती है। देखा तो मैनें उस विशाल सागर को भी नहीं पर उसके भेजे उन बादलों को जरूर देखा है। इस पवन को भूलूँ कैसे जो न होती तो मलय की खुशबू वहीं मर जाती। ये जो अगन मेरे पेट में लगी है, अगर वह नहीं होती तो खाया पिया पचाता कौन? प्राण को देख सका कौन पर हाड़ माँस के इस पिंजर को चलते फिरते जरूर देखा है। धरती पर बहती नदियों को भी देखा है पर नही जानता था कि वे निर्जन पहाड़ों से जीवन लेकर मैदानों में उतरती है।
तू वैसे तो मुझे कभी न दिखा पर ऐसे तो पल पल दिखता है। पहले मैं चूक गया था कि मैं बच्चों के रुदन में, किलकारियों में, मासूमियत में तुझे देख नही पाया। अरे वहाँ भी तू है और यहाँ तो तू है ही। तू मुझ से कितना प्रेम करता है। महसूस करना चाहिये हमेशा। जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है।
रामनारायण सोनी
८.२.२१
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