आत्मदीप
लघु काल-चिन्तन ९४
"अपनी दुनिया सजाएँ"
हर आदमी में एक शिल्पी मौजूद है। जैसे मूर्तिकार के पास केवल छैनी-हथौड़ा होता है अौर सामने पडा होता है एक बेडौल सा पत्थर। हथौड़ा चलाने के पहले ही वह अपने मन में सब कुछ गढ़ लेता है। उसका मन त्रिकाल दर्शी है। कैसे उस पत्थर में छुपी भविष्य की मूर्ति देख लेता है। जाहिर है कि भीतर का प्रतिबिम्ब ही बाहर आता है। सृजन तो उसके भीतर भरे कल्पनालोक का ही उत्सर्जन है। उत्सर्जन वास्तव में तो ऊर्जा का विसर्जन है और ऊर्जा चेतना का प्रसाद है, चेतना परमात्मा की कृपा ही है। शायद वह यह जानता नहीं पर ऐसा है ही।
यह शिल्प कभी काव्य है, कभी चित्र है, कभी बिम्ब है, स्वयं का व्यक्तित्व है, कभी भौतिक-अभौतिक निर्माण है। एक बारगी सम्पूर्ण प्रक्रिया को नए सिरे से देखें तो यह मन के संकल्पों और निकल्पों से छन कर आई कृतियाँ है। मन की इस अपरिमित शक्ति का जिन्हें अहसास नहीं वे उस बड़े से ताले के समान हैं जो कुबेर के कोष में उसके दरवाजे पर टँगा रहता है।
हर शिल्प में, हर सृजन में, हर बिम्ब में आपके मन का ही प्रतिबिम्ब है इसलिये तब नहीं तो अब शुभ संकल्प वाला बनाएँ। मौलिक सृजन हमारी सब की अपनी-अपनी पूँजी है। कुछ अच्छा सा बनाएँ। अपनी दुनिया अपनी तरह से सजाएँ।
येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत्परिगृहीतममृतेन सर्वम्। येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥ऋग्वेद/२३/४॥
अर्थ जिस शाश्वत मन के द्वारा भूतकाल, वर्तमान काल और भविष्यकाल की सारी वस्तुएँ सब ओर से ज्ञात होती हैं और जिस मन के द्वारा सात होतावाला यज्ञ विस्तारित किया जाता है, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्प वाला हो।
रामनारायण सोनी
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