आत्मदीप
लघु काल-चिन्तन २७
सब चल रहे हैं
हम सब चल रहे हैं। कहाँ से आ रहे हैं? कहाँ जा रहे हैं? आखरी छोरों पता नहीं पर बीच में तो हम चल ही रहे हैं नदी की तरह, हवा की तरह, सूरज-चाँद की तरह, दिन रात की तरह। कभी वाहन में बैठ कर कभी कुर्सी में बैठ कर। आश्चर्य तो यह है कि हम बैठे-बैठे या खड़े रह कर भी चल रहे हैं। ब्रह्माण्ड का कण-कण चल रहा है। लेकिन जो खड़े-खड़े या पड़े-पड़े चल रहा है वह हम जान नहीं पा रहे हैं।
सूर्य खुद में चल रहा है, ग्रह-उपग्रह उसके इर्द-गिर्द चल रहे हैं। ऐसे में हम धरती पर चाहे सो रहे हैं तो भी हम सूर्य के आस पास एक कक्षा में चल रहे हैं। आपको जान कर अचरज होगा कि जड़ अणु-परमाणु में भी इलेक्ट्रॉन नान स्टॉप चल रहा है।
इन सब का यह चलना तो पता चल गया पर चलाने वाला कहीं दिख नहीं रहा है। यह भी पता नहीं कि सब के सब नियमबद्ध चल रहे हैं पर ये नियम किसने बनाए हैं? वे सब के सब वैसे ही चल रहे हैं जैसे उनके लिए नियम बनाए गए हैं।
बाल्यावस्थामें जो शरीर था, वह बदल गया। साथी, सामग्री, भाव, उद्देश्य, इन्द्रियाँ सब बदल गयीं फिर भी मुझ में मौजूद यह "मैं" तो वही हूँ, यह नहीं बदला, मेरी अस्मिता वही की वही है। मैं वही हूँ, यह सत्य है। ॐ तत्सत्। सत्-तत्त्व ज्यों-का-त्यों है। मैं वही अमर आत्मा हूँ।
रामनारायण सोनी
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