आत्मदीप
लघु काल-चिन्तन ८६
जो चाहेसि उजियार
मेरे भीतर आप और आपके भीतर मैं नहीं देख पाऊँगा लेकिन कोशिश करने पर अपने अपने भीतर हम जरूर देख सकते हैं। आपके भीतर का अनुभव आपके पास है और मेरा मेरे पास। मैने गुड़ खाया तो आपका मुँह मीठा नहीं हो सकेगा। आपका जाना हुआ भी आपका है। आपकी प्यास आपके पानी पीने से ही बुझेगी दूसरे शब्दों में कहें तो आप आर प्यासे हैं तो पानी की तलाश आपको करनी होगी। मैं पानी की उपलब्धता की सूचना भर दे सकता हूँ। पानी के बारे में मै या कोई और आपको बताएगा वह सूचना भर है। आपका अनुभव ही आपका वास्तविक ज्ञान है उसके विषय बाकी में जानकारियाँ ज्ञान नहीं सूचनाएँ है। प्रेम की जानकारी प्रेम नहीं है, प्रेम भरी चेष्टाएँ भी प्रेम नहीं है वह प्रदर्शन तो हो सकता है प्रेम नहीं। आपका अन्तर का कण कण प्रेम में डूब जाएगा प्रेम तभी हो सकेगा। उपासना, प्रार्थना, आराधना, भजन आदि जो भी आप करना चाहें आपको स्वयं करनी होगी। यह समझ लेना जरूरी है कि मेरी चेतना का जागरण आपको नहीं मुझे ही करना होगी केवल चेतना के बारे में काम नहीं चलेगा। कोई आपका दिया सुलगा सकता है पर आपके अन्तर के प्रकाश के लिये दिया आपका अपना दिया ही काम आवेगा। इसलिये स्वयंप्रकाश चाहिये तो आत्मदीप जलाइये। मीरा ने प्रेम किया वह मीरा का था। आपको अपना अपने स्वये द्वारा ही करना पड़ेगा। आपका अनुभव ही आपका ज्ञान है। भोजन की सूचनाओं से पेट भरने वाला नहीं भूखे हो तो भोजन करना पड़ेगा। ईश्वर की अनुभूति चाहिये तो भक्ति, उपासना, प्रार्थना जो भी करना हो स्वयं को करना है।
"आत्मदीप आपका प्रकाश स्तम्भ है।"
राम नाम मनि दीप धरु जीह देहरी द्वार।
तुलसी भीतर बाहिरेउ जो चाहेसि उजियार।।
रामनारायण सोनी
०२.०२.२१
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