आत्मदीप
लघु काल-काल चिन्तन ८७
"पमात्मा और प्रकृति"
वृक्ष का जीवन जड़ों से है जो दिखाई नहीं देती जबकि वृक्ष स्वयं ही जीवित दिखाई पड़ता है। वृक्ष को कहीं से भी काट दें तो जड़ों से जीवन फिर लौट आवेगा जबकि पूरा जमीन का पूरा ऊपरी भाग साबुत रहे लेकिन जड़ें काट दी जाएँ तो वृक्ष मर जावेगा। सागर को देखें तो लहरें और पानी की सतह दिखाई देती है सागर नही। हमें जीवन दिखाई देते हैं जीवन के ने मूल स्रोत और जीवन को धारण करने वाली शक्ति नहीं दिखाई पड़ती। जो दृश्यमान है वह किसी अदृश्य शक्ति की बदौलत चल रहा है। रथ के घोड़े चलते हुए दिखाई देते हैं घोड़ों में विद्यमान प्राणशक्ति दिखलाई नहीं पड़ती। नदी सूखी पड़ी हो और अचानक बाढ़ आ जाए तो समझो कि उसकी अपस्ट्रीम में कहीं बारिश हुई है अथवा किसी जलस्रोत से पानी छोड़ा गया है। हमारे जीवन की जड़ें भी प्राण से सिंचित हैं जो हमें दिखाई नहीं देते फिर ये प्राण भी उस अदृश्य शक्ति से अनुप्राणित है उसको देख पाना असंभव है। इसे पतंजलि ने अनुमान प्रमाण कहा है। यह गणित का प्रमेय अर्थात् थ्योरम भी नहीं है जो किसी भौतिक अभौतिक साधन से सिद्ध की जा सकती है। इस सम्पूर्ण जगत में जो कुछ दृश्यमान है वह उस अदृश्य की अदृश्य शक्ति से अनुशासित है।
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।७/४ श्रीमद्भगवद्गीता।।
पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश -- ये पञ्चमहाभूत और मन, बुद्धि तथा अहंकार, यह आठ प्रकार के भेदों वाली मेरी 'अपरा' प्रकृति है। हे अर्जुन ! इस अपरा प्रकृति से भिन्न जीवरूप बनी हुई मेरी 'परा' प्रकृति को जान, जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है।
"महसूस करो ईश्वर की उस शक्ति को और स्वयं उस परम को।"
रामनारायण सोनी
०२.०२.२१
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