आत्मदीप
लघु काल-चिन्तन ८८
"यह पल ही मेरा है"
एक आदमी आइने के सामने खड़ा हुआ अपने आप को निहार रहा था। देखते देखते उसके चेहरे की हवाइयाँ उड़ने लगी। उसे अपनी शक्ल में भविष्य की झुर्रियाँ दिखाई देने लगी। जरावस्था दिखाई देने लगी। हाथ पैरों में अकड़न होने लगी। एक अनपेक्षित हताशा मन में उठने लगी। बहुत घबड़ाया और आइने के सामने से हट गया। अपने हाथों से खुद को टटोला चेहरे पर हाथ घुमाया उसे आनन्द हुआ सब ठीक तो है मैं यूँ ही परेशान हुआ भविष्य की परिकल्पना में। वह लौट कर कुर्सी पर बैठ गया। अचानक उसका ध्यान सामने पड़े फोटो एल्बम पर गया। उसने खोल कर देखा। उस एल्बम में उसके बचपन के चित्र लगे थे। एक प्यारा सा बचपन। वह उन छायाओं के संग-संग फिर अतीत में डूब गया। उसे लगा कितना सुहाना बचपन था, सब कुछ खो गया। आदमी फिर मायूस हुआ। एक से निकल कर फिर एक और हताशा में पड़ गया। घबड़ा कर उसने अल्बम कबड़ में रख दिया। वह इस सफोकेशन से बाहर निकलने के लिये खिड़की के पास चला गया। बाहर झाँक कर देखा- पंछी गा रहे थे, शीतल मन्द सुगन्धित हवा बह रही थी, पेड़ की नर्म टहनियों पर नव कोंपलें सज रही थी। दूर कहीं कोई पछिपि बाँसुरी पर राग यमन बजा रहा था। यह सब देख देख आनन्दित होता रहा।
यह आदमी कोई और नहीं मैं ही था। मैं वर्तमान को छोड़ का भविष्य और भूतकाल में उलझा हुआ था, वर्तमान में थी ही नहीं। जैसे ही वर्तमान में लौटा सारे अवसाद चले गये। अतीत वह है जिसे कोई लौटा नहीं सकता, भविष्य वह है जिस पल की किसी को खबर नहीं है। लेकिन यह गारन्टी है कि वर्तमान मेरा है मैं चाहूँ तो इसे जियूँ। अगर इसे जिया नहीं तो अगले पल यह अतीत हो जाएगा। दीवार पर टँगी घड़ी में सेकण्ड का वह काँटा कुछ कह रहा है। उसने दूसरे दो काँटों को इतिहास दर्ज करने के लिये छोड़ दिया है। स्वयं बस वर्तमान लिये चल रहा है। वह वर्तमान जो अतीत का बीज और भविष्य का निर्माता है। केवल आज ही नही, यह 'अभी' मेरा है। अभी नहीं तो कभी नहीं। यह देखिये मैं आपसे संवाद कर के कितना खुश हूँ। आप भी हैं ना?
रामनारायण सोनी
०३.०२.२१
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