"आत्मदीप"
*लघु काल-चिन्तन*
देश-काल-परिस्थिति
स्वाति नक्षत्र की बूँद जब जमीन पर गिरे तो धूल में मिल जाती है लेकिन यदि केले पर गिरे तो कपूर, सर्प के मुख मे गिरे तो विष और सीप के गर्भ मे समा जाए तो मोती बन जाती है।
यहॉं देश स्थान है, स्वाँति काल है और धारण करना परिस्थिति का निर्माण होना है। एक बूँद के ट्रान्स्फार्मेशन में अलग अलग परिणाम देश काल और परिस्थिति पर निर्भर है। चोर का चाकू हत्यारा है और सर्जन का चाकू जीवन त्राता होता है।
सीपी को मोती चाहिये इसलिये वह उसे मिली बूँद के खास मौके को भुनाती है और फिर संयम से उसे धारण करती है; लहरों के शोर और सतह की उथल-पुथल से घबराए बिना ही। फिर आत्मसिंचन की ऊर्जा से बूँद को मोती के रूप में ट्रान्सफार्म करती है। आत्मबोध के बिना आत्मसिंचन नहीं होगा।
मौका तो मुझे मिल गया पर जब तक मैं यह न समझ लूँ कि " हाँ! मैं कर सकता हूँ", तब तक मैं कुछ भी नहीं कर सकता।
🚶तो चलो आज कोई अच्छा सा ट्रान्सफार्मेशन करें।
रामनारायण सोनी
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