लघु काल-चिन्तन
चिलम और सुराही
कबीरा लोहा एक है, गढ़ने में है फेर।
ताहि का बखतर बने, ताहि की शमशेर॥
एक दिन मटकी सोचने लगी, कुछ सोच कर कुम्हार को धन्यवाद कहने लगी। बोली, मैं तब मिट्टी ही थी। कुम्हार ने चाक पर चढ़ाई और कुछ चिलमें बना दी।
अचानक उसे जाने क्या सूझा उसने वे चिलमें तोड़ दी और फिर चाक पर चढ़ा कर उसी मिट्टी से मटकी बना दी। मटकी कहने लगी कि मैं अगर चिलमें बनतीं तो जाने कितने कलेजे जलाती पर अब मटकी हो कर लोगों की प्यास शीतल जल से बुझाती हूँ। मेरे सृजन करने वाले ने कितनी कृपा की है मुझ पर।
इसी तरह मैं भी तो कृतज्ञ हूँ उस पावन
परमेश्वर का जिसने मुझे सँवारने में कसर नहीं छोड़ी। आदमी उसने बना दिया, इन्सान मुझे बनना है। चलो न तुम भी।
रामनारायण सोनी
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