आत्मदीप
लघु काल-चिन्तन ७२
"प्रेम की आनन्दानुभूति"
मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते चढ़ते माँगों की फहरिश्त लम्बी क्यों हो जाती है? आरती के प्रारम्भ होने के पहले से ही प्रसाद का इन्तजार क्यों रहता है? कल जो माँग कर ले गए थे उसे कही रख कर भूल गये और आज एक फ्रेश डिमाण्ड सामने रख दी। चरणामृत से ज्यादा ध्यान पञ्चामृत में लगा रहता है।
चूहा बिल खोदता है तो मिट्टी कुरेद-कुरेद कर पाँव से पीछे फेंकता रहता है और आगे बढ़ता चलता जाता है। कभी कभी मिट्टी को पीछे धकाते धकाते खुद की हटाई इस मिट्टी से ही वह अपने बिल में बन्द हो जाता है। और कहावत यह भी है- "खोदत खोदत मूसा मर गए मौज करी भुजंगों ने।" अपनी माँगों के अधिभार तले खुद न दब जाना। माँगों की गठरी द्वार पर ही छोड़ जाओ, फिर जो घटेगा वह अप्रतिम होगा, अद्भुत होगा।
परमात्मा तुम्हारा मौन अधिक सुनता है। वह संसार की सारी भाषाओं को जानता है पर उससे अधिक मौन की भाषा समझता है। इस मौन में प्रेम के, भक्ति के,आराधना के, समर्पण के भाव सिक्त हों तो बेतार के सभी तार सीधे जुड़ जाते हैं। तुम रहस्यलीन, लवलीन, तल्लीन हुए बिना नहीं रह सकते। तुम्हें लगेगा रस भरे बादल आये और तुम पर बरस पड़े और तुम तरबतर हो गए हो, भीतर से भी लबालब भर गये हो।
रामनारायण सोनी
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