आत्मदीप
लघु काल-चिन्तन १०५
"समत्व योग"
दो पूनम के बीच एक अमावस क्यों आती है यह एक सोच है और यह सच भी है। दूसरी सोच है चाहे जितनी अमावस आवें बीच में पूनम आवेगी ही, यह भी तो सच ही है। दोनों सच स्वीकार्य होने चाहिये पर जीवन में सकारात्मक सोच के विकास के लिये दूसरी तरह की धारणा आवश्यक है। अन्धकार और प्रकाश के बीच द्वन्द्व कभी नहीं था क्योंकि वे चिर संगी हैं और नियति का आवश्यक अंग भी हैं। सुख और दु:ख जीवन की बहती नदी के दुकूल हैं और आवश्यकीय अंग भी हैं। भिन्न भिन्न प्रतिकूलताएँ दुनिया में मौजूद हैं पर उनके बीच समन्वय रख कर खड़े रहना योगी का प्रधान गुण है। वह समझता है दोनों अनित्य हैं आवेंगे भी और चले भी जाएँगे। नदी में बहाव तो आम रहता है पर बाढ़ नित्य नहीं रहती। हर पतझड़ के बाद बसन्त आता है। आंधियाँ, बिजली की कौंध और बारिश कष्ट और असुविधा भले ही पैदा कर दे पर जल के रूप में जीवन का संचार होता है। ज्वालामुखी का फटना त्रासदी है पर लावा जमेगा तब मिट्टी बन सोना उगलेगी। एक ध्वंस के बाद सृजन का अवतरण होता है।
प्रतिक्षा करो अनुकूल समय की। अपनी संवेदनाओं पर संयम रखें। यही समत्व योग है।
रामनारायण सोनी
०१.०३.२०२१
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